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'अमेरिकी सेना लंबे समय तक युद्ध लड़ने में असमर्थ है'

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27 जून 2026, 06:57 PM 8 मिनट में पढ़ें 2

 कारेन यू. क्वाटकोवस्की
कारेन यू. क्वाटकोवस्की

तेहरान । डेस्क: तेहरान टाइम्स को दिए एक विशेष साक्षात्कार में, सेवानिवृत्त अमेरिकी वायु सेना लेफ्टिनेंट कर्नल और पूर्व पेंटागन विश्लेषक कारेन यू. क्वाटकोवस्की ने दावा किया है कि ईरान के खिलाफ हालिया अमेरिकी-इजरायली सैन्य कार्रवाइयों ने न केवल वाशिंगटन के रणनीतिक उद्देश्यों को विफल कर दिया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी प्रभुत्व के पतन को भी तेज कर दिया है. 


क्वाटकोवस्की के अनुसार, इस संघर्ष के बाद पश्चिम एशिया में एक नई सुरक्षा संरचना उभर रही है, जिसमें अमेरिकी सैन्य अड्डों और खोखले वादों की कोई जगह नहीं होगी. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और वैश्विक मंच पर डॉलर की घटती साख पर खुलकर बात की. 

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उनका मानना है कि यह युद्ध अमेरिकी साम्राज्य की कमजोरियों को उजागर करने वाला एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ है, जिसने दुनिया भर के निवेशकों और देशों को पश्चिम से दूर पूर्व की ओर देखने के लिए प्रेरित किया है. प्रस्तुत है इस महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक विमर्श पर आधारित प्रश्नोत्तरी:


सवाल: कुछ लोगों का मानना है कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 'सत्ता परिवर्तन' के विचार को बढ़ावा देकर राष्ट्रपति ट्रंप को ईरान के साथ युद्ध में घसीटा. आप इस विचार से किस हद तक सहमत हैं?


जवाब: मैं इस बात के पहले हिस्से से पूरी तरह सहमत हूँ. नेतन्याहू और कांग्रेस में उनके राजनीतिक एजेंट पिछले कई दशकों से ईरान के साथ सीधे युद्ध की वकालत कर रहे थे. जब ट्रंप ने जून 2025 में बमबारी का आदेश दिया और इस साल 28 फरवरी को युद्ध की शुरुआत की, तो यह पूरी तरह से नेतन्याहू के उकसावे और प्रभाव में किया गया था. इसके सबूत अमेरिकी विदेश मंत्रालय, पेंटागन और खुद राष्ट्रपति के बयानों में साफ देखे जा सकते हैं. हालांकि, 'सत्ता परिवर्तन' का तर्क महज एक लोकप्रिय नारा है, जिसका इस्तेमाल अमेरिका और इजरायल अपने साम्राज्य विस्तार को सही ठहराने के लिए करते हैं. जब सीआईए संचालित रंगीन क्रांतियों, हत्याओं और चुनावी हेरफेर से काम नहीं बनता, तब सैन्य संघर्ष शुरू किया जाता है. असल में, यह युद्ध दोनों देशों के कुलीन वर्गों के लिए मुनाफे का सौदा था. ट्रंप और नेतन्याहू के लिए इसका मुख्य उद्देश्य जमीन और संसाधनों पर कब्जा करना तथा अब्राहम समझौते के जरिए निवेश के अवसरों को बढ़ाना था, लेकिन उन्होंने ईरान और खाड़ी देशों की ताकत को बहुत कम करके आंका.


सवाल: आपके विचार में, इस युद्ध का भविष्य के भू-राजनीतिक परिदृश्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा?


जवाब: वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य पिछले 15 वर्षों से लगातार बदल रहा है, क्योंकि अमेरिकी सेना अधिक कमजोर और महंगी हो गई है. इस हालिया बदलाव का सबसे बड़ा कारण तकनीक है, जहाँ दुनिया के अन्य बड़े देश अमेरिका और यूरोप की तुलना में तेजी से और सस्ते में नवाचार कर रहे हैं. इस युद्ध ने साबित कर दिया है कि अमेरिका, अधिकांश यूरोप और इजरायल की मौजूदा आंतरिक कमजोरियों को सुधारना अब नामुमकिन है. पूरी दुनिया अमेरिकी साम्राज्य के पतन को देख रही है. अमेरिका और इजरायल की अर्थव्यवस्थाएं व्यापारिक बाधाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं और अमेरिकी सेना लंबे समय तक विदेशी युद्ध लड़ने में असमर्थ है. इसके अलावा, भारी-भरकम अमेरिकी संघीय कर्ज और डॉलर की मुद्रास्फीति ने दुनिया भर के निवेशकों, आपूर्तिकर्ताओं और उपभोक्ताओं का ध्यान अमेरिका से हटाकर उन क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित कर दिया है जहाँ संबंध अधिक शांति और लाभांश लाते हैं. अब मध्य पूर्व के लिए एक नई सुरक्षा संरचना विकसित हो रही है जो अमेरिकी प्रभाव से मुक्त होगी.


सवाल: अमेरिका और इजरायल पर इस संघर्ष के दौरान कई युद्ध अपराधों के आरोप लगे, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय निकायों ने कोई कार्रवाई नहीं की. इस निष्क्रियता का क्या कारण है?


जवाब: इजरायल का युद्ध का तरीका दुश्मन को एक सेना के रूप में नहीं, बल्कि एक पूरी आबादी और सभ्यता के रूप में लक्षित करता है. इजरायल की यह सोच अब अमेरिकी सरकार और पेंटागन द्वारा भी अपनाई जा रही है. इसलिए, इजरायली अपराध वास्तव में अमेरिकी अपराध हैं. दोनों देशों ने वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षण संगठनों (संयुक्त राष्ट्र और गैर-सरकारी संगठनों) में शामिल राजनेताओं को वित्त पोषित करने और प्रभावित करने के लिए अरबों डॉलर खर्च किए हैं. ये संगठन वित्तीय रूप से पश्चिमी प्रणाली पर निर्भर हैं. अमेरिका घरेलू राजनीति के लिए भले ही संयुक्त राष्ट्र की आलोचना करे, लेकिन वह इस पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए इसकी फंडिंग करता है ताकि उसके या उसके सहयोगियों के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई न हो सके. इसका समाधान भी यही है कि दुनिया भर में ऐसे नए जवाबदेही केंद्र विकसित किए जाएं जो अमेरिकी डॉलर पर निर्भर न हों और अमेरिकी प्रतिशोध के प्रति संवेदनशील न हों.


सवाल: ट्रंप ने युद्ध के तीव्र चरण और युद्धविराम के दौरान कई बार कड़े अल्टीमेटम दिए, लेकिन बाद में वे उनसे पीछे हट गए. अमेरिकी राष्ट्रपति की इस रणनीति का आपका क्या आकलन है?


जवाब: मेरा मानना है कि ट्रंप अमेरिकी साम्राज्य और उसकी सेना की वास्तविक क्षमताओं से काफी हद तक अनभिज्ञ हैं. यह अज्ञानता उनके उस व्यक्तित्व के साथ मिलती है जो खाली धमकियों और विरोधियों पर कीचड़ उछालने पर फलता-फूलता है. चूंकि वे लगातार ऐसी धमकियां देते रहे जिन्हें अमेरिकी सेना पूरा नहीं कर सकती थी, इसलिए वे एक मजाक बनकर रह गए हैं. वे सोचते हैं कि उनके सोशल मीडिया बयान और धमकियां उनके व्यक्तिगत वित्तीय साम्राज्य के लिए फायदेमंद हैं, भले ही इसके लिए उन्हें अपनी राष्ट्रपति पद की विश्वसनीयता खोनी पड़े. हालांकि, उनकी ये धमकियां खतरनाक हैं क्योंकि वाशिंगटन में नव-रूढ़िवादी (नियोकॉन) और जायोनी तत्व इसका फायदा उठाकर किसी भी तरह की 'फाल्स फ्लैग' (छद्म) घटना को अंजाम दे सकते हैं.


सवाल: क्या आपको लगता है कि फारस की खाड़ी के अरब देश इस युद्ध के बाद अपने सुरक्षा सिद्धांतों में बदलाव करेंगे?


जवाब: वे पहले से ही ऐसा कर रहे हैं. वे अब अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय शिया-सुन्नी और सांस्कृतिक मतभेदों से ऊपर उठकर आपस में सुरक्षा समझौते कर रहे हैं. पिछले कुछ महीनों में ईरान की प्रतिरोध और रक्षा रणनीतियों ने वैश्विक स्तर पर एक बहुध्रुवीय दुनिया की योजना को गति दी है. ईरान ने अपने क्षेत्रीय पड़ोसियों के साथ-साथ चीन और रूस जैसी प्रमुख शक्तियों के साथ गंभीर और सम्मानजनक राजनयिक परामर्श का एक सफल मॉडल प्रदर्शित किया है. हालांकि, इस क्षेत्र को सावधानी से आगे बढ़ना होगा क्योंकि एक घायल और डरा हुआ जानवर सबसे ज्यादा खतरनाक होता है, और यही स्थिति फिलहाल इजरायल की है.


सवाल: कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ईरान-अमेरिका समझौते पर इजरायलियों का गुस्सा महज 'अच्छे पुलिसवाले और बुरे पुलिसवाले' का नाटक है. आपकी इस पर क्या राय है?


जवाब: मुझे लगता है कि इजरायली वास्तव में ईरान के सैन्य वर्चस्व से डरे हुए हैं और अमेरिकी साम्राज्य के पतन से घबराए हुए हैं, जिसने 70 से अधिक वर्षों तक उनके हर युद्ध अपराध को संरक्षण दिया है. खुद ट्रंप किसी के साथ ऐसा नाटक करने के लिए बहुत कम अनुशासित हैं. वे नेतन्याहू से नाराज हैं क्योंकि वे केवल विजेताओं का समर्थन करते हैं और नेतन्याहू का जाना तय लग रहा है. अमेरिका में दक्षिणपंथी मीडिया और राजनीतिक तंत्र ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (MOU) की आलोचना कर रहे हैं, और ट्रंप खुद इस बात से निराश हैं क्योंकि वे अपनी गलतियों के कारण हुई रणनीतिक हार को स्वीकार नहीं कर सकते. अब अमेरिकी जनता में भी जायोनवाद के खिलाफ असंतोष साफ देखा जा सकता है.


सवाल: यदि इजरायल इस समझौते को अपने लिए नकारात्मक मानता है, तो इसे कमजोर करने के लिए वह क्या कदम उठा सकता है?


जवाब: दुर्भाग्य से, इजरायल और अमेरिका में बैठे जायोनी तत्व इस समझौते को तोड़ने के लिए हर संभव कोशिश करेंगे. हमें आने वाले समय में लक्षित हत्याएं, छद्म हमले और परमाणु या जैव-आतंकवाद जैसे अपरंपरागत युद्ध के तरीकों के इस्तेमाल के लिए तैयार रहना चाहिए. उनके लिए जायोनवाद एक राजनीतिक विचारधारा है, कोई धर्म नहीं, इसलिए उनके राजनेताओं के लिए नैतिकता का कोई महत्व नहीं है यदि उससे उनके हितों को नुकसान पहुंचता हो.


सवाल: ईरान और अमेरिका के बीच एक स्थायी समझौते की कितनी संभावना है, और इसमें सबसे बड़ी बाधाएं क्या हैं?


जवाब: मैं एक आशावादी हूँ और मुझे लगता है कि अगले 60 दिनों में वार्ता पूरी होने की 80% संभावना है. ट्रंप भी अपने कार्यकाल की विरासत के लिए युद्ध को समाप्त देखना चाहते हैं. यह समझौता ज्ञापन अमेरिका को मिलने वाला सबसे अच्छा सौदा है, जो सैनिकों को वापस बुलाने के ट्रंप के पुराने वादे के अनुकूल है. इजरायल अब अकेले दम पर ऐसा युद्ध जारी रखने की स्थिति में नहीं है जिसे जीता न जा सके. जैसे-जैसे दुनिया डॉलर और पश्चिमी ऊर्जा पर निर्भरता कम करेगी, इजरायल आने वाली सदी में अलग-थलग पड़ जाएगा. ट्रंप का ध्यान जल्द ही घरेलू राजनीति और कांग्रेस में रिपब्लिकन बहुमत बचाने पर केंद्रित हो जाएगा, और वे भविष्य में इजरायल के अगले प्रधानमंत्री के साथ अधिक संप्रभु तरीके से व्यवहार करेंगे.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP