अमेरिका-ईरान युद्ध: क्या सुपरपावर अमेरिका रणनीतिक रूप से पिछड़ गया?
नई दिल्ली । डेस्क: पिछले पांच हफ्तों से चल रहे भीषण अमेरिका-ईरान संघर्ष में एक बड़ा मोड़ आया है. पाकिस्तान की मध्यस्थता और चीन के हस्तक्षेप के बाद दोनों देश दो हफ्ते के युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं. हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सैन्य रूप से ताकतवर होने के बावजूद, अमेरिका इस युद्ध में एक 'रणनीतिक हार' का सामना कर रहा है.
शुक्रवार को इस्लामाबाद में दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल पहली बार आमने-सामने की बातचीत करेंगे. इस वार्ता का आधार ईरान का वह '10-सूत्रीय शांति प्रस्ताव' है, जिसे पाकिस्तान के जरिए व्हाइट हाउस भेजा गया है.
ईरान की कड़ी शर्तें: क्या झुक गया है अमेरिका?
ईरानी मीडिया द्वारा जारी किए गए शांति प्रस्ताव में कुछ ऐसी शर्तें शामिल हैं जिन्हें अमेरिका पहले सिरे से खारिज करता रहा है. इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
* ईरान पर लगे सभी प्राथमिक और माध्यमिक प्रतिबंधों को हटाना.
* मध्य पूर्व से अमेरिकी सेना की पूरी तरह वापसी.
* ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को मुक्त करना.
* इस समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के जरिए कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाना.
विश्लेषकों का कहना है कि ईरान की ये शर्तें युद्ध से पहले की तुलना में कहीं अधिक सख्त हैं.
ट्रंप का दावा बनाम जमीनी हकीकत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को "100 प्रतिशत पूर्ण विजय" करार दिया है. उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि वॉशिंगटन 'टैरिफ और प्रतिबंधों में ढील' पर चर्चा करेगा. हालांकि, उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि जो देश ईरान को हथियार सप्लाई करेंगे, उन पर 50 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया जाएगा.
दूसरी ओर, ईरान की 'सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल' ने इसे अपनी "ऐतिहासिक जीत" बताया है. जानकारों का कहना है कि ट्रंप का शुरुआती लक्ष्य ईरान में 'सत्ता परिवर्तन' करना था, जिसे उन्हें जल्द ही छोड़ना पड़ा.
होर्मुज जलडमरूमध्य: ईरान का सबसे बड़ा हथियार
इस युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक बिंदु 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' रहा है. दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है. युद्ध के कारण यहाँ यातायात ठप हो गया था. अब युद्धविराम के बाद ईरान ने कहा है कि उसकी सेना के साथ समन्वय के बाद ही जहाजों का सुरक्षित मार्ग संभव होगा.
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका युद्ध के मैदान पर तो हावी था, लेकिन वह उस आर्थिक और रणनीतिक 'लीवरेज पॉइंट' (होर्मुज) को नियंत्रित नहीं कर सका, जो वैश्विक बाजार को प्रभावित करता है.
महंगे मिसाइल बनाम सस्ते ड्रोन: अमेरिका को हुआ भारी नुकसान
रणनीतिक मोर्चे पर अमेरिका और इजरायल को एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा. ईरान ने अपनी 'मोज़ेक डिफेंस' तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसमें छोटे और सस्ते ड्रोन्स और मिसाइलों से हमले किए गए. इन सस्ते हमलों को रोकने के लिए अमेरिका और इजरायल को अपने बेहद महंगे और अत्याधुनिक एयर डिफेंस मिसाइलों को खर्च करना पड़ा. विश्लेषकों ने इसे अमेरिका की एक बड़ी आर्थिक और सैन्य 'गलत गणना' बताया है.
ईरान का लचीलापन और नेतृत्व की सुरक्षा
अमेरिका को उम्मीद थी कि ईरान के शीर्ष नेताओं को निशाना बनाने से वहां की व्यवस्था ढह जाएगी, लेकिन ईरान ने 'लेयर्ड सक्सेशन सिस्टम' (उत्तराधिकार की परतों वाली व्यवस्था) अपना रखी थी. दिवंगत अयातुल्ला अली खामेनेई ने पहले ही हर बड़े पद के लिए चार-चार उत्तराधिकारी तय कर दिए थे, जिससे नेतृत्व कभी पंगु नहीं हुआ.
ट्रंप के लिए घरेलू चुनौतियां
अमेरिका में होने वाले मिड-टर्म चुनावों के बीच ट्रंप की लोकप्रियता रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है. उन पर "विदेशी युद्ध न लड़ने" के अपने वादे को तोड़ने का आरोप लग रहा है. साथ ही, युद्ध के कारण तेल और गैस की बढ़ती कीमतों ने अमेरिकी जनता में भारी नाराजगी पैदा कर दी है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को तीन घंटे के भीतर पकड़ने की सफलता ने ट्रंप को अति-आत्मविश्वासी बना दिया था, जिसके कारण उन्होंने ईरान की प्रतिरोध क्षमता को कम करके आंका.
क्या टिका रहेगा यह युद्धविराम?
यह युद्धविराम बेहद नाजुक है. जानकारों का कहना है कि ट्रंप ने अभी तक अपनी सेना वापस नहीं बुलाई है और वे इस दो हफ्ते के समय का उपयोग भविष्य की जमीनी कार्रवाई की तैयारी के लिए कर सकते हैं.
वहीं, इस पूरे घटनाक्रम में 'इजरायल' सबसे बड़ा अनिश्चित कारक बना हुआ है. यदि इजरायल अपनी ओर से ईरान पर हमले जारी रखता है, तो अमेरिका चाहकर भी इस युद्ध से बाहर नहीं निकल पाएगा. विशेषज्ञों को डर है कि कहीं यह संघर्ष 'इजरायल-ईरान सीधी जंग' में न बदल जाए, जो पूरे क्षेत्र के लिए विनाशकारी हो सकता है.
फिलहाल दुनिया की नजरें इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता पर टिकी हैं. क्या दुनिया का सबसे ताकतवर देश एक सम्मानजनक समझौते के साथ बाहर निकल पाएगा, या मध्य पूर्व का यह 'दलदल' उसे और गहरा खींच लेगा, यह आने वाले 14 दिन तय करेंगे.