नेपाल संसद में सीमा विवाद पर हंगामा
नई दिल्ली । डेस्क: नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह द्वारा भारत के साथ सीमा विवाद को लेकर दिए गए एक बयान पर दोनों देशों में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है. इस विवादित टिप्पणी के कारण नेपाल की संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही को बाधित होना पड़ा, वहीं भारत ने इस मामले में किसी भी तीसरे देश की भूमिका को सिरे से खारिज कर दिया है.
नेपाल के प्रधानमंत्री ने संसद में कहा था कि सीमा विवाद के समाधान के लिए नेपाल न केवल भारत के साथ बातचीत कर रहा है, बल्कि वह चीन और ब्रिटेन (यूके) के भी संपर्क में है. उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि यह समस्या ब्रिटिश-भारत के समय से चली आ रही है, इसलिए इसमें इंग्लैंड को भी शामिल किया जाना चाहिए.
उनके इस बयान पर नेपाल के भीतर ही विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध जताया और प्रधानमंत्री से बयान वापस लेने तथा उसे संसद के रिकॉर्ड से हटाने की मांग को लेकर भारी हंगामा किया. विपक्ष के इस गतिरोध के चलते प्रतिनिधि सभा (निचले सदन) को 8 जून तक और राष्ट्रीय सभा को बुधवार तक के लिए स्थगित कर दिया गया है.
अपने संबोधन में पीएम बालेन ने यह भी स्वीकार किया कि केवल भारत ही नहीं, बल्कि नेपाल ने भी कई स्थानों पर भारतीय क्षेत्रों पर अतिक्रमण किया है.
दूसरी ओर, भारत ने इस मामले पर बेहद सख्त और स्पष्ट रुख अपनाया है. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नई दिल्ली में एक साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा कि भारत और नेपाल के बीच सीमा से जुड़े सभी मामलों को सुलझाने के लिए पहले से ही द्विपक्षीय तंत्र (bilateral mechanisms) मौजूद हैं.
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि दोनों देशों के इस द्विपक्षीय मुद्दे में किसी भी तीसरे पक्ष के लिए कोई भूमिका नहीं है और यह बात सभी संबंधित पक्षों को स्पष्ट होनी चाहिए.
भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत और नेपाल की लगभग 98 प्रतिशत सीमा का सीमांकन पहले ही पूरा हो चुका है. कुछ हिस्से अभी भी अनसुलझे हैं, जिसका मुख्य कारण गंडक नदी के बहाव का बदलना है.
इसके अलावा, सीमांकित क्षेत्रों में नो-मैन-लैंड पर सीमा पार से कब्जे और अतिक्रमण के मामले भी सामने आए हैं, जिनकी वर्तमान में संयुक्त रूप से मैपिंग की जा रही है. भारत ने लगातार यह रुख बनाए रखा है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी जैसे विवादित क्षेत्र उत्तराखंड का अभिन्न हिस्सा हैं.