संयुक्त राष्ट्र ने दी दुनिया के नए नक्शे की मंजूरी: वर्तमान में वर्ष 1569 नक्शा चलन में
UNGA ने दी दुनिया का नया नक्शा अपनाने के प्रस्ताव को मंजूरी
न्यूयॉर्क । डेस्क: सदियों से हम भूगोल की किताबों और दीवारों पर दुनिया का जो नक्शा देखते आए हैं, वह जल्द ही बदलने वाला है. संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने दुनिया का एक नया नक्शा अपनाने के लिए एक ऐतिहासिक प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. अफ्रीका और दुनिया के कई विकासशील देशों की पहल पर लाए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य मानचित्र में महाद्वीपों के असली और सटीक आकार को दर्शाना है. संयुक्त राष्ट्र के इस कदम से अब दुनिया के नक्शे पर अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्र अपने वास्तविक विशाल आकार में दिखाई देंगे.
पुराने नक्शे की बड़ी गलती का सुधार
अब तक इस्तेमाल में लाया जाने वाला पारंपरिक नक्शा 'मर्केटर प्रोजेक्शन' पर आधारित था, जिसे वर्ष 1569 में फ्लेमिश मानचित्रकार गेराडस मर्केटर ने समुद्री जहाजों के नेविगेशन के लिए तैयार किया था. इस नक्शे की सबसे बड़ी कमी यह थी कि इसने भूमध्य रेखा के पास स्थित क्षेत्रों को छोटा और उत्तरी ध्रुव के करीब स्थित समृद्ध देशों को आकार में बहुत बड़ा दिखाया. उदाहरण के लिए, पुराने नक्शे में ग्रीनलैंड और अफ्रीका का आकार लगभग बराबर दिखता था, जबकि वास्तविकता यह है कि अफ्रीका ग्रीनलैंड से 14 गुना बड़ा है. अफ्रीका महाद्वीप इतना विशाल है कि इसमें अमेरिका, चीन, भारत और लगभग पूरा यूरोप समा सकता है.
'इक्वल अर्थ' नक्शे की खासियत और यूएन का फैसला
संयुक्त राष्ट्र ने जिस नए नक्शे को अपनाने की सिफारिश की है, उसे 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' कहा जाता है. इसे वर्ष 2018 में अंतरराष्ट्रीय मानचित्रकारों द्वारा तैयार किया गया था. यह नया नक्शा महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल और सतह के अनुपात को पूरी तरह सही बनाए रखता है. संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव के समर्थन में 164 देशों ने मतदान किया. फ्रांस जैसे विकसित देश ने भी इसका सह-प्रायोजन करते हुए पुराने मर्केटर नक्शे को छोड़ने का ऐलान किया है. फ्रांस के अनुसार, पुराना नक्शा अमेरिका, रूस और चीन को गैर-जरूरी रूप से बड़ा दिखाता था और यह बदलाव सच्चाई को सामने लाने की दिशा में एक बड़ा कदम है.
अमरीका ने क्यों किया विरोध?
इस वैश्विक बदलाव के खिलाफ केवल संयुक्त राष्ट्र के एक सदस्य देश अमेरिका ने वोट किया, जबकि छह अन्य देश मतदान से दूर रहे. अमेरिकी प्रतिनिधि ने अपना विरोध जताते हुए कहा कि वैश्विक संगठन को असल और गंभीर मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि 16वीं शताब्दी की नक्शेबाजी से जुड़े विवादों में समय गंवाना चाहिए. हालांकि, अफ्रीका और अन्य देशों का मानना है कि नक्शे समाज की सोच और बच्चों की शिक्षा को प्रभावित करते हैं, इसलिए भौगोलिक सच्चाई का सामने आना बेहद जरूरी था. हालांकि यूएन का यह प्रस्ताव अनिवार्य नहीं है, लेकिन इसने दुनिया भर के शैक्षणिक संस्थानों और सरकारों को नया 'इक्वल अर्थ' नक्शा अपनाने के लिए प्रेरित किया है.