UCC से समाप्त होगा महिलाओं का भेदभाव: तसलीमा नसरीन
कोलकाता । डेस्क: निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की पुरजोर वकालत की है. उन्होंने कहा है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को खत्म करने के लिए ऐसा कानून बेहद जरूरी है. इसके साथ ही उन्होंने भारत के पड़ोसी देशों बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी UCC लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया है.
संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए 63 वर्षीय लेखिका ने कहा कि दुनिया के सभी उन्नत देशों में UCC जैसे कानून लागू हैं. भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान तीनों देशों में इसकी सख्त आवश्यकता है. कानून सभी के लिए समान होना चाहिए, क्योंकि महिलाएं आज भी भारी भेदभाव का सामना कर रही हैं, जिसे UCC के जरिए काफी हद तक दूर किया जा सकता है.
नसरीन की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब बंगाल सरकार ने राज्य में प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड के ड्राफ्ट की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है. सरकारी अधिसूचना के अनुसार, इस कानून के दूरगामी प्रभावों और व्यापक स्वरूप को देखते हुए यह पैनल बनाया गया है, जो किसी भी अगले कदम से पहले ड्राफ्ट बिल की गहन जांच करेगा.
बांग्लादेश का जिक्र करते हुए नसरीन ने कहा कि समानता ही किसी सभ्यता की बुनियाद होती है, लेकिन वहां कई स्तरों पर महिलाओं के साथ असमानता बनी हुई है. बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं को समान अधिकार नहीं हैं और वे अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा हासिल नहीं कर सकतीं. यदि वहां की हिंदू महिलाओं को भी समान अधिकार और आजादी देनी है, तो यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करना ही होगा.
लगभग 19 वर्षों बाद कोलकाता वापस लौटीं तसलीमा नसरीन का हाल ही में रवींद्र सदन में आयोजित एक राज्य सरकार के कार्यक्रम में नागरिक अभिनंदन किया गया था. वह वर्ष 2007 में अपनी विवादित किताब 'द्विखंडितो' के प्रकाशन के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण शहर छोड़कर चली गई थीं.
कार्यक्रम के दौरान हुए एक घटनाक्रम पर दुख व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि जब विख्यात कवि जॉय गोस्वामी को दर्शकों के एक वर्ग के विरोध के कारण मंच छोड़ना पड़ा, तो उन्हें खुद अपमानित महसूस हुआ. तसलीमा ने कहा कि यह न केवल कवि का, बल्कि उनका भी अपमान था क्योंकि उन्होंने ही गोस्वामी को आमंत्रित किया था.
नसरीन ने अभिव्यक्ति की आजादी पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब वे मंच से बोल रही थीं, तब लोग उनके विचारों का समर्थन कर रहे थे, लेकिन जब एक कवि को बोलने के लिए बुलाया गया तो लोगों ने उन्हें सुनने से मना कर दिया. यह आचरण पूरी तरह से विरोधाभासी है और किसी को भी अपने विचार व्यक्त करने से रोकना सही नहीं है.