बेंगलुरु के AI टाउनशिप परियोजना से दो लाख पेड़ कटेंगे
नई दिल्ली । डेस्क: बेंगलुरु के बाहरी इलाके बिदादी में प्रस्तावित महत्वाकांक्षी 'एआई-पावर्ड टाउनशिप' परियोजना पर्यावरण और आजीविका के बड़े संकट के रूप में उभर रही है. इस परियोजना के लिए बिदादी के नौ गांवों की जमीन अधिग्रहित की जानी है, जिसके चलते क्षेत्र में करीब दो लाख फलदार और छायादार पेड़ों को काटने की तैयारी है.
एक आरटीआई जवाब से मिले आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस ग्रीन कवर में मुख्य रूप से 83,536 सुपारी (आरकानेट), 87,903 नारियल, 12,550 आम और 2,344 चीकू के पेड़ शामिल हैं. इसके अलावा 3 लाख से अधिक केले के पौधे और बड़े पैमाने पर रेशम के खेत भी इस परियोजना की भेंट चढ़ जाएंगे.
क्षेत्र में सबसे बड़ा झटका रागी की खेती को लगेगा, जो करीब 231 एकड़ में फैली हुई है.
इस बड़े पैमाने पर होने वाले विनाश के खिलाफ स्थानीय किसानों ने मोर्चा खोल दिया है. आंदोलन कर रहे किसानों का कहना है कि यह परियोजना न केवल क्षेत्र के पर्यावरण को तबाह कर देगी, बल्कि उनकी समृद्ध आजीविका और जीवन स्तर को भी छीन लेगी.
दूसरी तरफ, ग्रेटर बेंगलुरु डेवलपमेंट अथॉरिटी (GBDA) के अधिकारियों का तर्क अलग है. एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, पास की बायरामनगला झील के प्रदूषण के कारण यहां की फसलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिससे बाजार में व्यापारियों के बीच इन्हें लेकर हिचकिचाहट रहती है.
अधिकारी ने दावा किया कि किसानों को बहुत कम मुनाफा हो रहा है और यह विरोध प्रदर्शन राजनीतिक रूप से प्रेरित है.
सरकार ने नुकसान की भरपाई के लिए प्रति पेड़ मुआवजा तय किया है, जिसमें नारियल और चीकू के लिए 25,000 से 40,000 रुपये और आम के लिए 45,000 से 64,000 रुपये तक की राशि निर्धारित की गई है. बागवानी विभाग पेड़ों की उम्र, जीवनकाल और मिट्टी की उर्वरता जैसे मानकों के आधार पर अंतिम मुआवजा तय करेगा.
हालांकि, कर्नाटक प्रांत रैता संघ (KPRS) जैसे किसान संगठनों का आरोप है कि सरकार ने इस परियोजना का कोई सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन तक नहीं कराया है, जिससे पर्यावरण के साथ-साथ सैकड़ों परिवार बेघर और बेरोजगार हो जाएंगे.