ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो का तेल के लिये अपहरण किया है
त्वरित टिप्पणी । जेके कर: आज अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के कथित सैन्य अपहरण और उन्हें न्यूयॉर्क लाकर अमेरिकी कानून के तहत मुकदमा चलाने के दावे ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है. यह प्रश्न केवल वेनेजुएला या अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे-सीधे अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा हुआ है.
किसी संप्रभु राष्ट्र के निर्वाचित राष्ट्रपति का अपहरण कर, उसे दूसरे देश में ले जाकर वहां के कानूनों के तहत मुकदमा चलाना-क्या यह अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक प्रोटोकॉल के अनुरूप है? या फिर यह केवल सैन्य और आर्थिक शक्ति के बल पर थोपी गई एकतरफा कार्रवाई है? निस्संदेह, सैन्य क्षमता के लिहाज़ से अमेरिका वेनेजुएला से कहीं अधिक शक्तिशाली है, लेकिन क्या यही शक्ति उसे वैश्विक नियमों से ऊपर खड़ा कर देती है?
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से यह धारणा लगातार मजबूत हुई है कि अमेरिका स्वयं को दुनिया का “स्वघोषित दरोगा” मानने लगा है. आज की घटना इस धारणा को और पुष्ट करती प्रतीत होती है. इसके बावजूद, वैश्विक राजनीति की जटिलताओं और युद्ध से बचने की सामूहिक मजबूरी के कारण कोई भी देश अमेरिका का प्रत्यक्ष विरोध करने की स्थिति में नहीं दिखता. बयान अवश्य दिए जा रहे हैं, लेकिन उनसे न तो अमेरिकी प्रशासन पर कोई वास्तविक दबाव पड़ता है और न ही लैंग्ली में बैठे रणनीतिकारों की योजनाओं पर कोई असर.
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे वेनेजुएला के विशाल तेल भंडारों की भूमिका को नज़रअंदाज़ करना भोलेपन के अलावा कुछ नहीं होगा. एक समय था जब वेनेजुएला के तेल क्षेत्र पर अमेरिकी एकाधिकार कंपनियों का वर्चस्व था, लेकिन 1976 में राष्ट्रपति कार्लोस आंद्रेस पेरेज़ के कार्यकाल में तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया. इसके परिणामस्वरूप विदेशी कंपनियों की संपत्तियां सरकारी नियंत्रण में चली गईं और पेट्रोलियोस डी वेनेजुएला (PDVSA) नामक राष्ट्रीय तेल कंपनी की स्थापना हुई.
बाद में राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज़ के शासनकाल में इस प्रक्रिया को और आगे बढ़ाया गया. तेल क्षेत्र में राज्य की भूमिका मजबूत हुई और अमेरिकी कंपनियों का प्रभाव लगातार सीमित होता गया. चावेज़ के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि सत्ता परिवर्तन के साथ परिस्थितियां बदलेंगी, लेकिन निकोलस मादुरो के सत्ता में बने रहने से यह मंशा पूरी नहीं हो सकी. यही वह बिंदु है जहां अमेरिका की बेचैनी खुलकर सामने आती है.
इतिहास गवाह है कि इस तरह की रणनीतियों का प्रयोग पहले भी किया जा चुका है. इराक में ‘विध्वंसक हथियारों’ का आरोप लगाकर सैन्य हस्तक्षेप किया गया, लेकिन बाद में वे हथियार कभी नहीं मिले. हां, सत्ता परिवर्तन अवश्य हुआ और तेल संसाधनों पर अमेरिकी तथा सहयोगी देशों की कंपनियों का नियंत्रण स्थापित हो गया. आज वेनेजुएला में जो घटित हो रहा है, वह उसी पटकथा का नया संस्करण प्रतीत होता है.
अंतर केवल इतना है कि इराक में सद्दाम हुसैन को हटाने में अमेरिका को भारी सैन्य संघर्ष का सामना करना पड़ा था, जबकि वेनेजुएला में राष्ट्रपति मादुरो के अपहरण का दावा बिना किसी बड़े प्रतिरोध के किया जा रहा है. अगला चरण-वेनेजुएला में मनचाही या कठपुतली सरकार की स्थापना-लगभग तय माना जा रहा है, जिससे तेल संसाधनों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की वापसी का रास्ता साफ हो सके.
इतिहास में राजाओं की लड़ाइयों के बाद पराजित पक्ष की संपत्ति को विजेताओं द्वारा आपस में बांट लेने की परंपरा रही है. आधुनिक विश्व व्यवस्था में यह प्रक्रिया हथियारों और सेनाओं की जगह संस्थानों, मुकदमों और “लोकतंत्र” के नारों के माध्यम से पूरी की जाती है. वेनेजुएला के तेल उद्योग के साथ भी कुछ ऐसा ही होते देखने की आशंका है.
इस संदर्भ में सीआईए के पूर्व निदेशक एलेन डलेस का वह कथन आज भी प्रासंगिक लगता है-“वह सरकार किस काम की, जो अमेरिकी संपत्तियों के लिए शांति और व्यवस्था कायम न रख सके? हमें सत्ता परिवर्तन पसंद है.” गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि चेहरे बदले हैं, राष्ट्रपतियों के नाम बदले हैं, लेकिन अमेरिकी नीति की बुनियाद लगभग वही है.
आने वाले समय में वेनेजुएला में एक ऐसे “नियम-विहीन खेल” की शुरुआत हो सकती है, जिसके नियम स्वयं अमेरिका तय करेगा. निकोलस मादुरो पर अमेरिका में मुकदमा चलाया जाएगा और निर्णय भी उसी सत्ता संरचना के अनुरूप होगा. इसके बाद तेल कंपनियों के बीच हिस्सेदारी का खेल शुरू होगा-और फिर संभव है कि अगला लक्ष्य कोई और तेल-समृद्ध देश हो.
तेल की राजनीति अमेरिका के लिए कोई नई बात नहीं है. यह एक पुरानी आदत है, जिसे समय-समय पर नए तर्कों और नए चेहरों के साथ दोहराया जाता रहा है.