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छत्तीसगढ़ कांग्रेस : आ बैल मुझे मार

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26 मई 2026, 07:55 AM 7 मिनट में पढ़ें 5

छत्तीसगढ़ कांग्रेस
छत्तीसगढ़ कांग्रेस

दिवाकर मुक्तिबोध


चुनावी राजनीति की दृष्टि से कांग्रेस के लिए छत्तीसगढ़ एक अत्यंत संभावनाशील राज्य रहा है. नवंबर 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद विधायकों के बहुमत के आधार पर अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी. उन्होंने भाजपा के एक दर्जन विधायकों को तोड़कर इस पार्टी को लगभग निष्प्रभावी बना दिया था. वैसे भी दशकों तक मध्यप्रदेश का हिस्सा रहने के दौरान छत्तीसगढ़ पूरी तरह कांग्रेसमय रहा. लेकिन अपने ही इस गढ़ में कांग्रेसियों ने सेंध लगाई. एक-दूसरे की टांग खींचने की प्रवृत्ति, अनुशासनहीनता, खेमेबाजी, नेतृत्व को कमतर आंकना, आम जनता से दूरी, कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता का अभाव तथा राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल धन अर्जित करने के लिए करने वाले नेताओं ने कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाया. वरना कोई कारण नहीं था कि भाजपा कांग्रेस की जमीन पर अपनी पौध खड़ी कर पाती.

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छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने वालों में दो नेता प्रमुख रहे- अजीत जोगी और विद्याचरण शुक्ल. जोगी ने पहले पार्टी में रहते हुए और बाद में अलग पार्टी बनाकर कांग्रेस की जड़ें खोदीं, जबकि विद्याचरण शुक्ल 2003 में नये राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय के कारण बने. यदि वे और तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी अपनी राजनीतिक दुश्मनी को दरकिनार कर पार्टी हित में समझदारी से काम लेते, तो 2003 का चुनाव जीतना भाजपा के लिए लगभग नामुमकिन था. 


पराजय के झटके के बाद भी गुटों में बंटे बड़े कांग्रेसी नेताओं ने कोई सबक नहीं लिया. नतीजतन भाजपा 2008 और 2013 का चुनाव भी जीत गई. लगातार पंद्रह वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद 2018 में भाजपा सत्ता से बाहर हुई, लेकिन संक्षिप्त अंतराल के बाद वह पुनः सरकार में लौट आई और कांग्रेस आज भी पहले की तरह अपने अंतर्विरोधों में उलझी हुई है.


फिर भी एक तथ्य इस बात की पुष्टि करता है कि तमाम संगठनात्मक कमजोरियों के बावजूद आम जनता का कांग्रेस पर विश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. इसी विश्वास के आधार पर जनता उसे वोट देती रही है. भले ही वह सरकार बनाने लायक बहुमत हासिल न कर पाती हो, लेकिन भाजपा को बराबरी की टक्कर लगातार देती रही है. 


राज्य गठन के बाद 2003, 2008 और 2013 के चुनावों में 37 से 39 सीटें जीतने वाली कांग्रेस बहुमत से बहुत दूर नहीं थी. उसे 2003 में 37, 2008 में 38 और 2013 में 39 सीटें मिलीं. अर्थात यदि वह अपनी कमजोरियों पर काबू पा लेती, तो इन चुनावों को जीतना उसके लिए कठिन नहीं था.


इस संदर्भ में यह भी ध्यान रखने योग्य है कि उस दौर में नरेंद्र मोदी और अमित शाह राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी नहीं थे और न ही धर्म आधारित राजनीति अपने उफान पर थी. साम्प्रदायिकता के आधार पर वोटों का तीखा ध्रुवीकरण भी नहीं होता था. यानी छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लिए बेहद अनुकूल राजनीतिक जमीन थी. लेकिन इसके बावजूद वह आत्ममुग्धता में डूबी रही और लगातार हारती रही. 


हालांकि 2018 के चुनाव में 90 में से 68 सीटें जीतकर उसने एक कीर्तिमान जरूर स्थापित किया, लेकिन इसकी बड़ी वजह भाजपा सरकार के खिलाफ तेज होती व्यवस्था-विरोधी लहर और उसके कुशासन के प्रति जनता का उभरता आक्रोश था. वोटों और सीटों का रिकॉर्ड बनाने वाली कांग्रेस इस जीत को पचा नहीं पाई और अपने ही कर्मों के कारण महज पांच वर्षों में बुरी तरह लुढ़क गई. 2023 के विधानसभा चुनाव में उसे केवल 35 सीटें मिलीं, जो अब तक का उसका सबसे खराब प्रदर्शन है.


प्रदेश की राजनीति में एक ब्रह्मवाक्य हर चुनाव के बाद जोर-शोर से गूंजता है कि कांग्रेस को कांग्रेस ही हराती है. खुद कांग्रेसी भी इसे दोहराते हैं, लेकिन अपने आचरण से बाज नहीं आते. यदि पार्टी के नेता आपसी तनातनी को किनारे रखकर एकजुटता की ताकत को समझें, जनता के बीच जाएं, उनके मुद्दे उठाएं, समस्याओं के समाधान में सक्रिय भूमिका निभाएं और उनके सुख-दुख में सहभागी बनें, तो कोई कारण नहीं कि कांग्रेस चुनाव न जीत सके.


प्रदेश में भाजपा की प्रचंड सफलता का एक बड़ा कारण आरएसएस रहा है, जिसके माध्यम से उसकी घर-घर तक पहुंच बनी. उसकी जीत के अन्य कारणों में पार्टी के प्रति समर्पण, कड़ा अनुशासन और विभिन्न स्तरों पर चुनाव का सटीक प्रबंधन शामिल हैं. तुलनात्मक दृष्टि से कांग्रेस इस मामले में काफी पीछे दिखाई देती है. 


अनुशासन और संगठनात्मक संकल्प किस चिड़िया का नाम है, यह या तो उसे पता नहीं, और यदि पता है भी तो उसे मानने-समझने की इच्छा नहीं दिखती. स्थिति यह है कि संगठन एक तरह से भगवान भरोसे चलता नजर आता है. वरिष्ठ नेताओं के अपने-अपने गुट हैं, जिन्हें न तो एक-दूसरे की परवाह है और न ही कार्यकर्ताओं के प्रति सम्मान का भाव.


क्या गांवों और शहरों के लोग यह कह सकते हैं कि पिछले पांच नहीं, पच्चीस वर्षों में भी किसी कांग्रेस कार्यकर्ता या नेता ने उनके घर पर एक-दो बार दस्तक दी हो या कभी संवाद स्थापित किया हो? मतदाताओं की संख्या को देखते हुए बहुत कम लोगों को यह अनुभव मिला होगा. यह काम सहज नहीं है, लेकिन नामुमकिन भी नहीं. 


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वर्षों से भाजपा के लिए यह काम पूरी निष्ठा से कर रहा है, लेकिन कांग्रेस के आनुषंगिक संगठनों, जैसे सेवा दल, की स्थिति क्या है? वे लगभग निष्प्राण पड़े हुए हैं. युवक कांग्रेस जरूर सक्रिय दिखाई देती है, लेकिन वरिष्ठ और युवा नेतृत्व के बीच तालमेल का अभाव स्पष्ट रूप से नजर आता है.


2018 में सत्ता में लौटने के बाद कांग्रेस को लंबी पारी खेलने का अवसर मिला था, लेकिन उसने अपने ही गोलपोस्ट में गोल कर वह मौका गंवा दिया. रमन सिंह की पंद्रह वर्षों की सत्ता का अंत कांग्रेस के रणनीतिक कौशल, उसकी एकजुटता या जमीनी स्तर पर उसके कामकाज के कारण नहीं हुआ था. मतदाता बदलाव चाहते थे, इसलिए उन्होंने भरभराकर कांग्रेस को वोट दिया. 68 सीटें जीतना निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी. भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने और शुरुआती दौर में सरकार का प्रदर्शन बेहतर रहा. सरकार की कुछ नई और जनकल्याणकारी नीतियों की देशभर में सराहना हुई. मुख्यमंत्री बघेल ने भी अपनी जन-छवि को मजबूत किया, 


लेकिन सरकार भ्रष्टाचार के मामलों में भी पीछे नहीं रही. अफसरों और नेताओं के सिंडिकेट ने अपने एजेंटों के जरिए अवैध ढंग से जमकर धन उगाही की. उस समय आम चर्चा थी कि बघेल सरकार कांग्रेस की ‘एटीएम’ बन गई है, जो पार्टी के लिए फंड जुटाती है. ऐसी तमाम सच्ची-झूठी चर्चाओं को कांग्रेस लगातार नजरअंदाज करती रही. नतीजा यह हुआ कि 2023 के चुनाव में भ्रष्टाचार के मुद्दों पर भाजपा की आक्रामकता का उसके पास कोई ठोस जवाब नहीं था. बघेल सरकार और संगठन के नेता जीत को लगभग तय मानकर हवा में उड़ते रहे, लेकिन मतगणना के दिन वे धड़ाम से जमीन पर आ गिरे.


गिरकर उठने वाले समझदार लोग अपनी गलतियों से सबक लेते हैं और फिर पहले से अधिक मजबूती के साथ खड़े होते हैं. अब सवाल यह है कि क्या प्रदेश कांग्रेस 2028 के चुनाव में वैसा ही करिश्मा दोहरा पाएगी जैसा 2018 में देखने को मिला था? फिलहाल किसी निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल है, क्योंकि यह पूरी तरह उसके जमीनी कामकाज पर निर्भर करेगा. 


संगठन के विभिन्न स्तरों पर नए और युवा पदाधिकारियों की नियुक्तियां हुई हैं. इससे उम्मीद जरूर बंधती है कि पार्टी बेहतर प्रदर्शन करेगी, बशर्ते वह वे गलतियां दोबारा न दोहराए, जो सत्ता में रहते हुए की गई थीं.


प्रदेश संगठन में तीन बड़े नेता हैं, भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव और चरणदास महंत. चौथा कोण प्रदेशाध्यक्ष दीपक बैज का है. यदि ये चारों नेता अपने दुराग्रहों को भुलाकर चुनाव जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर एकजुट हो जाते हैं, तो जीत की संभावनाएं बन सकती हैं. लेकिन अभी यह दूर की कौड़ी ही लगता है.


अगले माह प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होना है और नेताओं के बीच अभी से घमासान शुरू हो चुका है. जिस पार्टी को भाजपा से लड़ने के लिए अपनी ऊर्जा बचानी चाहिए, वह एक बार फिर भीतर की लड़ाइयों में उलझती दिख रही है. कांग्रेस की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है कि वह अक्सर विपक्ष से कम, अपने ही नेताओं की महत्वाकांक्षाओं से ज्यादा हारती है.


छत्तीसगढ़ की राजनीति बार-बार यह साबित कर चुकी है कि यहां कांग्रेस को जनता नहीं हराती, बल्कि उसका अहंकार, अव्यवस्था और अंतर्कलह हराते हैं. भाजपा ने जहां संगठन, अनुशासन और दीर्घकालिक रणनीति के बल पर अपनी जड़ें मजबूत कीं, वहीं कांग्रेस अवसर मिलने पर भी आत्मघाती राजनीति से बाहर नहीं निकल पाई.


यदि 2028 में भी नेताओं की प्राथमिकता जनता के मुद्दों से अधिक पद, प्रभुत्व और निजी शक्ति प्रदर्शन ही रही तो कांग्रेस को किसी सकारात्मक परिणाम की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.


*लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP