रवि, 18 अक्टू. 2026

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आदिवासी समाज चिंतित

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और आदिवासी समाज की चिंता

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05 अग. 2025, 02:38 PM 4 मिनट में पढ़ें 5

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

जगदलपुर | संवाददाताः सुप्रीम कोर्ट ने बीते 17 जुलाई को एक मामले की सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया कि आदिवासी समाज में महिलाओं को संपत्ति का अधिकार मिलना चाहिए. इस फैसले को ऐतिहासिक बताया गया, लेकिन आदिवासी समाज में इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है.


फैसले के 19 दिनों बाद बस्तर के सर्व आदिवासी समाज ने प्रेस नोट जारी कर इस पर आपत्ति दर्ज की है. प्रेस नोट में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश कॅस्टमरी लॉ के विपरीत है. कोर्ट को एक बार और तर्क व तथ्यों के साथ अपने फैसले को देखना चाहिए. 

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फैसले को लेकर सर्व आदिवासी समाज द्वारा आशंका व्यक्त करते हुए कहा गया है कि इस फैसले से आने वाले समय में पूरे देश में घर-घर में गृह युद्ध छिड़ने की प्रबल संभावना को नकारा नहीं जा सकता है.


घर-घर में झगड़ा होगा, कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पड़ेंगे. समाज केवर कोर्ट के चक्कर काटते रह जाएगा. सुप्रीम कोर्ट से अपील की गई है कि न्यायालय को अपने इस फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए.


जमीन कुल की संपत्ति

आदिवासी समाज का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के पूरे प्रकरण को देखने पर पता चलता है कि सदन टेकाम पिता रामचरन के द्वारा अपील में अपने आप को हिंदू बताते हुए, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत संपत्ति का बंटवारा चाहा गया था.


सभी निचली अदालतों में यह कहकर कि हिंदू उत्तराधिकार नियम आदिवासियों पर लागू नहीं होता, मामले को खारिज कर दिया गया. समाज का कहना है कि आदिवासी में जमीन कुल की संपत्ति होती है.


इसीलिए आदिवासियों में खास करके गोंड समाज में कुल वधू प्रथा प्रचलित है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में आदिवासी समाज की प्रथा व कानून को अनदेखा कर दिया गया है.


आदिवासी गोंड समाज की परंपरा व कानून

कॅस्टमरी लॉ के अंतर्गत आने वाले गोंड समाज में महिलाओं को अपने पति की संपत्ति पर 100 प्रतिशत अधिकार होता है. पति की मृत्यु उपरांत जमीन पर पत्नी का अधिकार हो जाता है. पत्नी की मृत्यु के बाद ही उनके बच्चों के नाम पर संपत्ति स्थानांतरित होती है.


बेटी को पिता की संपत्ति में परंपरागत रूप से अधिकार नहीं दिया जाता है. कुल वधू प्रथा के अनुसार बेटी दूसरे कुल की सदस्य मानी जाती है और जहां शादी होती है, वहां उन्हें 100 प्रतिशत मालिकन का दर्जा प्राप्त है. गोंड समाज में दहेज प्रथा का चलन नहीं है.


इस समाज में महिला-पुरुष में कोई असमानता नहीं है. पुरुष के साथ ही महिला भी सभी रस्मों व रिवाजों में समान रूप से हिस्सा लेती हैं. गोंड समाज में लड़का वाला शादी के लिये लड़की ढूंढ़ता है न कि लड़की वाला. समाज में कोर्ट मैरिज को मान्यता नहीं है. 


आदिवासी समाज की आपत्तियां

आदिवासी समाज का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला गोंड समाज की कस्टमरी लॉ (रूढ़ि प्रथा विधि) के विपरीत है. इससे घर-घर में संपत्ति विवाद और झगड़े बढ़ सकते हैं. महिलाओं पर पारिवारिक दबाव और शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना की आशंका है.


अदालतों में मुकदमों की बाढ़ आने की संभावना, जिससे वर्षों तक सुनवाई लंबित रहेगी. समाज की पुरानी और संतुलित परंपराएं टूटने का खतरा, जिससे दहेज और भ्रूण हत्या जैसी अमानवीय प्रथाएं पनप सकती हैं.


आदिवासी समाज ने सवाल उठाया है कि महिला जो एक बेटी के रूप में भी रहेगी, एक पत्नी के रूप में भी रहेगी और एक मां के रूप में भी रहेगी, तीनों जगह पारिवारिक तौर पर उनको जो अधिकार मिलेगा तो उसके वारसाना हक के लिए वह क्या एक बेटी की हैसियत से कोर्ट के शरण में जाएगी या एक पत्नी की हैसियत से या एक मां की हैसियत से? 


आदिवासी समाज का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक तरफ महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करता है तो वहीं दूसरी तरफ आदिवासी समाज की परंपराओं और सामाजिक संरचना पर गहरा प्रभाव डाल सकता है. जागरूकता ही बचाव है. समाज इस पर गहराई से चिंतन मनन कर सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगा. इसके लिए ट्राइबल लीगल एड विंगइंडिया से लगातार चर्चा जारी है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP