यह दवा मरीजों को लंबे समय तक डायलिसिस से बचाएगी
नई दिल्ली । डेस्क: किडनी की पुरानी बीमारी (क्रॉनिक किडनी डिजीज) से जूझ रहे मरीजों के लिए चिकित्सा जगत से एक बेहद राहत भरी खबर आई है. दुनिया की तीन प्रतिष्ठित मेडिकल पत्रिकाओं- न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन, जामा (JAMA) और द लांसेट में छपे शोध के मुताबिक, 'फिनेरेनोन' (Finerenone) नाम की दवा अब सिर्फ डायबिटीज ही नहीं, बल्कि कई अन्य कारणों से होने वाली किडनी की बीमारियों में भी उतनी ही कारगर साबित हो रही है.
इस दवा के इस्तेमाल से किडनी खराब होने की रफ्तार को धीमा किया जा सकता है और मरीजों को लंबे समय तक डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की नौबत से बचाया जा सकता है.
आमतौर पर माना जाता है कि किडनी की बीमारी सिर्फ डायबिटीज के कारण होती है, लेकिन कई बार हाई ब्लड प्रेशर या शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में गड़बड़ी (ऑटोइम्यून डिसऑर्डर) के कारण भी किडनी के फिल्टर खराब हो जाते हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, फिनेरेनोन दवा किसी बीमारी विशेष पर काम करने के बजाय किडनी के अंदर होने वाली सूजन और घाव (स्कारिंग) को रोकती है, जो लगभग हर तरह की किडनी की बीमारी में आम बात है.
करीब 14,500 से अधिक मरीजों पर किए गए तीन बड़े वैश्विक अध्ययनों में यह साफ हुआ है कि इस दवा ने किडनी की कार्यक्षमता घटने की रफ्तार को कम किया है और यूरिन में प्रोटीन के रिसाव को करीब 42 प्रतिशत तक नियंत्रित किया है.
इस शोध से जुड़े एक्सपर्ट और इंडियाना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. राजीव अग्रवाल के अनुसार, यह खोज भारतीय मरीजों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है. भारत में किडनी की कुछ खास बीमारियों के इलाज के लिए जो दवाएं उपलब्ध हैं, वे बहुत महंगी हैं और उनका सालाना खर्च 4 से 5 लाख रुपये तक आता है, जिसे आम आदमी वहन नहीं कर सकता.
इसके मुकाबले फिनेरेनोन दवा भारत में पहले से उपलब्ध है और इसका रोजाना का खर्च करीब 80 से 90 रुपये आता है. साल 2028 में इस दवा का पेटेंट खत्म होने के बाद इसकी कीमत में और भी भारी गिरावट आने की उम्मीद है, जिससे इलाज का खर्च और भी कम हो जाएगा.
हालांकि, डॉक्टरों ने यह भी साफ किया है कि यह दवा हर मरीज के लिए नहीं है. इस दवा के इस्तेमाल से शरीर में पोटेशियम का स्तर बढ़ने का खतरा रहता है, जो दिल की धड़कन के लिए नुकसानदेह हो सकता है. इसलिए जिन मरीजों का पोटेशियम स्तर पहले से ही सामान्य से अधिक (5 मिलीमोल प्रति लीटर से ज्यादा) है, उन्हें यह दवा नहीं दी जा सकती.
राहत की बात यह है कि नियमित ब्लड टेस्ट के जरिए इस खतरे को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में लोग आनुवंशिक रूप से डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के प्रति अधिक संवेदनशील हैं, इसलिए यहां किडनी की बीमारी का खतरा ज्यादा रहता है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लोगों को इस बीमारी का पता तब चलता है जब किडनी काफी हद तक खराब हो चुकी होती है.
डॉक्टरों का मानना है कि इस नई दवा का पूरा फायदा तभी मिल सकता है जब बीमारी की पहचान शुरुआती स्टेज में हो. इसके लिए केवल एक साधारण और सस्ता यूरिन टेस्ट कराकर समय रहते यह पता लगाया जा सकता है कि किडनी में कोई नुकसान तो नहीं शुरू हुआ है, ताकि 'आग लगने से पहले ही धुएं को पहचानकर' इलाज शुरू किया जा सके.