मानव मस्तिष्क संभाल सकता है केवल 150 रिश्ते
नई दिल्ली । डेस्क: मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसके लिए सामाजिक रिश्ते बनाना एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है. शोध बताते हैं कि मानव मस्तिष्क का विकास ही सामाजिक बंधन स्थापित करने के लिए हुआ है. हालांकि, इन रिश्तों को संभालने की एक सीमा है. वैज्ञानिकों का दावा है कि एक इंसान अपने जीवनकाल में अधिकतम 150 रिश्ते ही सफलतापूर्वक निभा सकता है, जो एक पुरानी और चर्चित अवधारणा को और मजबूत करता है.
मनुष्य का मस्तिष्क, जिसका वजन लगभग 1.36 किलोग्राम है और शरीर के कुल वजन का लगभग दो प्रतिशत है, का एक-तिहाई भाग निओकोर्टेक्स नामक क्षेत्र से बना होता है. यह हिस्सा स्मृति, भाषा विकास, समस्या-समाधान और आत्म-चेतना के लिए जिम्मेदार है, और यही मनुष्यों के बीच संबंधों, दोस्ती और सामाजिकता को नियंत्रित करता है.
वैज्ञानिकों के अनुसार, सामाजिक बंधन हमारी उम्र बढ़ाते हैं और लोगों के मिलने-जुलने से स्ट्रोक, अवसाद, स्मृति-भ्रंश और हृदय रोगों की संभावना कम होती है.
शोध के अनुसार, हम अपने जीवनकाल में हजारों लोगों को जान सकते हैं, लेकिन हमारा वास्तविक सामाजिक 'नेटवर्क' 150 लोगों तक सीमित रहता है. यह सीमा मस्तिष्क के निओकोर्टेक्स के आकार पर निर्भर करती है.
चिंपैंजी में यह सीमा 50 तक ही सीमित है, जबकि मानव मस्तिष्क का निओकोर्टेक्स बड़ा होने के कारण यह नेटवर्क भी बड़ा है.
ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक रॉबिन दनबार ने इस विषय पर व्यापक शोध किया है. उनके अनुसार, मनुष्यों के सामाजिक संपर्क के लिए 150 की यह संख्या आदिकाल से एक समान रही है और सोशल मीडिया तथा डिजिटल संचार के युग में भी इसमें कोई बदलाव नहीं आया है.
सामाजिक दायरे की संरचना
एक अवधारणा के अनुसार, 150 के इस दायरे में सबसे करीबी रिश्ते लगभग पांच लोगों के साथ होते हैं. ये आमतौर पर परिवार के सदस्य या घनिष्ठ मित्र होते हैं, जिनके साथ हम भावनाओं को साझा करते हैं और सप्ताह में कम से कम एक बार संपर्क में रहते हैं. इसके अलावा, एक 10 दोस्तों का और समूह होता है, जिनसे महीने में कम से कम एक बार मुलाकात होती है. ये कुल 15 लोग हमारे सामाजिक ध्यान का लगभग 60 प्रतिशत प्राप्त करते हैं.
इन 15 लोगों के साथ मिलकर लगभग 50 लोगों का एक बड़ा सामाजिक दायरा बनता है, जिनसे हम कभी-कभी मिलते हैं और मौज-मस्ती करते हैं, लेकिन इनके साथ कोई गहरा भावनात्मक जुड़ाव नहीं होता है.
इसके बाद 150 लोगों का सबसे बड़ा दायरा आता है. ये वे लोग होते हैं जिनसे बहुत घनिष्ठ संपर्क नहीं होता, लेकिन जीवन के किसी बड़े कार्यक्रम या समारोह में उन्हें आमंत्रित किया जाता है. उनके अनुसार, "अगर रात के 3 बजे हांगकांग हवाई अड्डे पर अचानक इनमें से किसी से मुलाकात हो जाए, तो हम उन्हें पीठ थपथपाने में संकोच नहीं करेंगे."
यह 150 लोगों का समूह जीवन भर स्थिर नहीं रहता है. समय और परिस्थितियों के अनुसार, जो लोग संपर्क से बाहर हो जाते हैं, वे धीरे-धीरे इस नेटवर्क से बाहर निकल जाते हैं और उनकी जगह नए लोग ले लेते हैं. पड़ोसी और सहकर्मी अक्सर इस बड़े दायरे का हिस्सा होते हैं.
अन्य परिचितों का दायरा
150 के दायरे से बाहर 350 और लोगों की बात है, जिनसे केवल परिचय होता है, लेकिन वे किसी समारोह में आमंत्रित किए जाने योग्य रिश्ते नहीं होते. इसके अलावा, जीवन भर हम लगभग 1000 लोगों को उनके चेहरे से पहचानते हैं, जैसे कि किसी देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति. हालाँकि, यह पहचान एकतरफा होती है, क्योंकि वे हमें नहीं जानते.
हालांकि, कुछ शोधकर्ता इस अवधारणा से सहमत नहीं हैं. विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि सामाजिक संपर्क की सीमा को 150 तक बाँधना व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है. उनका मत है कि सोशल मीडिया के युग में परिचितों और संबंधों का दायरा बढ़ना स्वाभाविक है.