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विदेशी कचरे से बिजली बना रहा स्वीडन, बदले में वसूल रहा मोटी रकम

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19 अग. 2026, 03:24 PM 3 मिनट में पढ़ें 3

कचरे से कमाई
कचरे से कमाई

स्टॉकहोम । डेस्क: यूरोप के कई देशों के लिए जो कचरा सिरदर्द बना हुआ है, वही कचरा स्वीडन के लिए एक बड़ा कारोबारी मॉडल बन चुका है. ब्रिटेन, नॉर्वे और इटली जैसे देशों से हर दिन ट्रकों और जहाजों में भरकर टन कचरा स्वीडन पहुंच रहा है. दिलचस्प बात यह है कि स्वीडन इस कचरे को मुफ्त में नहीं ले रहा, बल्कि अन्य देश उसे अपने यहां का कचरा हटाने के लिए बाकायदा भुगतान कर रहे हैं. स्वीडिश पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में स्वीडन ने 29.2 लाख टन कचरा आयात किया था, जो 2024 तक बढ़कर 38.6 लाख टन पर पहुंच गया है.


कचरे की कमी से जूझ रहा है स्वीडन का हीटिंग सिस्टम


इस पूरे तंत्र की शुरुआत स्वीडन के डिस्ट्रिक्ट हीटिंग सिस्टम से हुई थी. दशकों पहले स्वीडन ने हर घर में अलग बॉयलर लगाने के बजाय पूरे इलाके को एक बड़े केंद्रीय संयंत्र से गर्म पाइपों के जरिए जोड़ने की प्रणाली तैयार की थी. अत्यधिक ठंड और सस्ते कचरे की उपलब्धता के कारण यह मॉडल बहुत सफल रहा. लेकिन समय के साथ स्वीडन में रीसाइक्लिंग की आदतें इतनी बेहतर हो गईं कि घरेलू कचरा लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गया. देश के पास इंसिनरेटर यानी कचरा जलाने वाले संयंत्र तो बड़े थे, लेकिन उनमें जलाने के लिए पर्याप्त ईंधन नहीं बचा. अपने संयंत्रों को चालू रखने के लिए स्वीडन ने पड़ोसी देशों से कचरा लेना शुरू कर दिया.

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दोहरी कमाई का अनोखा कारोबारी मॉडल


स्वीडन के इस मॉडल में कचरा प्रबंधन कंपनियों की दोनों हाथों में लड्डू हैं. पहला तो वे विदेशी कचरे को स्वीकार करने के लिए गेट फीस के रूप में शुल्क वसूलती हैं. दूसरा, उसी कचरे को जलाकर पैदा हुई बिजली और गर्मी को स्वीडिश नागरिकों को बेचती हैं. जानकारों के मुताबिक, यह कारोबार अरबों क्रोनर का हो चुका है. ब्रिटेन और नॉर्वे जैसे देशों के लिए भी यह सौदा सस्ता पड़ता है, क्योंकि स्वीडन कचरा भेजना उनके अपने देशों में लैंडफिल टैक्स देने या नए संयंत्र लगाने से काफी किफायती है.


लाखों घरों में पहुंच रही है बिजली और गर्मी


स्वीडन में कचरा जलाने से मिलने वाली ऊर्जा का बहुत बड़ा योगदान है. देश के कुल डिस्ट्रिक्ट हीटिंग का लगभग एक-चौथाई हिस्सा कचरे के दहन से ही आता है. वर्ष 2022 में इस क्षेत्र ने 17.9 टेरावाट घंटे गर्मी और करीब 3 टेरावाट घंटे बिजली का उत्पादन किया. स्वीडिश एनर्जी एजेंसी की मानें तो इस ऊर्जा से 14 लाख से अधिक अपार्टमेंटों को गर्म रखा जा सकता है और लगभग 9.4 लाख घरों को बिजली दी जा सकती है. हालांकि, कचरा प्रबंधन संघ का कहना है कि स्वीडन विदेशी कचरे पर पूरी तरह निर्भर नहीं है; अगर आपूर्ति रुकती है तो वे जैव ईंधन का उपयोग कर सकते हैं.


पर्यावरणविदों की चिंता और कार्बन उत्सर्जन की चुनौती


स्वीडन का यह मॉडल आर्थिक रूप से जितना सफल दिखता है, पर्यावरण के मोर्चे पर उतनी ही चुनौतियां खड़ी कर रहा है. कचरे में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक होता है, जो मूल रूप से कच्चे तेल से बनता है. इसे जलाने से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस निकलती है. आंकड़े दर्शाते हैं कि स्वीडन के कंबाइंड हीट एंड पावर सेक्टर से होने वाले कुल उत्सर्जन में 73 प्रतिशत हिस्सेदारी कचरा जलाने वाले संयंत्रों की है. पर्यावरण समूहों का यह भी मानना है कि स्वीडन के इस सस्ते विकल्प के कारण अन्य यूरोपीय देश अपने यहां रीसाइक्लिंग ढांचे को सुधारने में सुस्ती बरत रहे हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP