तलाक-ए-हसन की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट बुधवार 21 जनवरी 2026 को मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तलाक की एक पद्धति तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा. यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब शीर्ष अदालत पहले ही 2017 में तत्काल तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित कर चुकी है.
19 नवंबर 2025 को हुई पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया था कि तलाक-ए-हसन की वैधता के प्रश्न को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजा जा सकता है. न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह किसी धार्मिक प्रथा को खत्म करने का नहीं, बल्कि उसे संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप विनियमित करने का मामला है.
यह मामला गाजियाबाद की रहने वाली बेगम नजीर हीना की याचिका से जुड़ा है. उन्होंने दावा किया है कि तलाक-ए-हसन की प्रथा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (भेदभाव निषेध), 21 (जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करती है. याचिका उनके वकील अश्विनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर की गई है.
सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ जिसमें न्यायमूर्ति सूर्यकांत, उज्जल भुइयां और एन. कोटिश्वर सिंह शामिल थे ने इस प्रथा पर गंभीर आपत्ति जताई थी.
खासतौर पर अदालत इस बात से असहज दिखी कि हीना के मामले में पति की ओर से तलाक की सूचना वकील द्वारा भेजी गई, जिस पर पति के हस्ताक्षर तक नहीं थे. अदालत ने टिप्पणी की कि “क्या एक सभ्य समाज में वकीलों द्वारा तलाक दिया जाना स्वीकार्य हो सकता है?”
तलाक-ए-हसन के तहत पति तीन महीनों में, हर महीने एक बार “तलाक” शब्द का उच्चारण करता है. पहली और दूसरी बार के बाद तलाक रद्द किया जा सकता है और पति-पत्नी के बीच सुलह की पूरी गुंजाइश रहती है. यदि तीसरे महीने में भी तलाक बोला जाए और इस बीच दांपत्य संबंध बहाल न हुए हों, तो तलाक अंतिम और अपरिवर्तनीय हो जाता है.
तत्काल तीन तलाक में एक साथ तीन बार “तलाक” बोलकर विवाह तुरंत समाप्त हो जाता है, जिसमें सुलह की कोई संभावना नहीं होती.
यही कारण है कि इसे सुप्रीम कोर्ट ने मनमाना और महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ मानते हुए असंवैधानिक करार दिया था. इसके विपरीत, तलाक-ए-हसन में समय, सोच-विचार और मेल-मिलाप की गुंजाइश रहती है.