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राज्यपाल विधेयकों को इस तरह रोक नहीं सकते-सुप्रीम कोर्ट

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08 अप्रै. 2025, 07:58 AM 4 मिनट में पढ़ें 1

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नई दिल्ली | डेस्क: सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि तमिलनाडु के राज्यपाल डॉ. आरएन रवि द्वारा 10 विधेयकों पर अपनी मंजूरी रोके रखना, जिनमें से सबसे पुराना विधेयक जनवरी 2020 से लंबित है, तथा राज्य विधानमंडल द्वारा पुनः अधिनियमित किए जाने के बाद उन्हें राष्ट्रपति के पास सुरक्षित रखना, कानून की दृष्टि से "अवैध और त्रुटिपूर्ण" है तथा इसे रद्द किया जाना चाहिए.


उक्त दस विधेयकों पर राष्ट्रपति द्वारा उठाए गए किसी भी परिणामी कदम को भी न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने गैर-कानूनी घोषित कर दिया है.


न्यायालय ने कहा कि दस विधेयकों को राज्य विधानसभा द्वारा पुनः पारित किये जाने के बाद दूसरे चरण में प्रस्तुत किये जाने पर, इसे राज्यपाल की स्वीकृति प्राप्त माना जाएगा.


न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा, "सामान्य नियम के अनुसार, विधानसभा द्वारा पारित किए जाने के बाद सरकार द्वारा दोबारा पेश किए जाने के बाद राज्यपाल के लिए किसी विधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित रखना संभव नहीं है. एकमात्र अपवाद तब होता है जब दूसरे दौर में पेश किया गया विधेयक पहले संस्करण से भिन्न होता है. "


अदालत ने कहा-"हम राज्यपाल के पद को कमतर नहीं आंक रहे हैं. हम बस इतना ही कहना चाहते हैं कि राज्यपाल को संसदीय लोकतंत्र की स्थापित परंपराओं के प्रति उचित सम्मान के साथ काम करना चाहिए, विधायिका के माध्यम से व्यक्त लोगों की इच्छा का सम्मान करना चाहिए और साथ ही लोगों के प्रति उत्तरदायी निर्वाचित सरकार का भी सम्मान करना चाहिए. उन्हें मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक की अपनी भूमिका को निष्पक्षता के साथ निभाना चाहिए, राजनीतिक लाभ के विचारों से नहीं बल्कि अपने द्वारा ली गई संवैधानिक शपथ की पवित्रता से निर्देशित होना चाहिए. संघर्ष के समय, उन्हें आम सहमति और समाधान का अग्रदूत होना चाहिए, अपनी बुद्धिमत्ता और बुद्धि से राज्य मशीनरी के कामकाज को सुचारू बनाना चाहिए, न कि उसे ठप करना चाहिए. उन्हें उत्प्रेरक होना चाहिए, अवरोधक नहीं. उनके सभी कार्य उनके उच्च संवैधानिक पद को ध्यान में रखते हुए किए जाने चाहिए." 


अदालत ने अपने फैसले में कहा- "यह अनिवार्य है कि उनके सभी कार्य उनकी शपथ के प्रति सच्ची निष्ठा से निर्देशित हों और वे अपने कार्यों को ईमानदारी से निष्पादित करें. राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में राज्यपाल राज्य के लोगों की इच्छा और कल्याण को प्राथमिकता देने और राज्य मशीनरी के साथ सद्भाव में ईमानदारी से काम करने के लिए बाध्य हैं."


अदालत ने साफ कहा- "राज्यपाल को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे राजनीतिक उद्देश्यों के लिए लोगों की इच्छा को विफल करने और तोड़ने के लिए राज्य विधानमंडल में अवरोध पैदा न करें या उसका गला न घोंटें. राज्य विधानमंडल के सदस्य राज्य के लोगों द्वारा लोकतांत्रिक परिणामों के परिणामस्वरूप चुने गए हैं और वे लोगों की भलाई सुनिश्चित करने के लिए बेहतर रूप से तैयार हैं. इसलिए, लोगों की स्पष्ट पसंद, दूसरे शब्दों में, राज्य विधानमंडल के विपरीत कोई भी अभिव्यक्ति संवैधानिक शपथ का उल्लंघन होगी."


अदालत ने अपने फैसले में कहा- "उच्च पदों पर आसीन संवैधानिक अधिकारियों को संविधान के मूल्यों द्वारा निर्देशित होना चाहिए. ये मूल्य, जिन्हें भारत के लोग बहुत महत्व देते हैं, हमारे पूर्वजों के वर्षों के संघर्ष और बलिदान का परिणाम हैं. जब निर्णय लेने के लिए कहा जाता है, तो ऐसे अधिकारियों को क्षणिक राजनीतिक विचारों में नहीं पड़ना चाहिए, बल्कि संविधान की मूल भावना से निर्देशित होना चाहिए. उन्हें अपने भीतर झांकना चाहिए और विचार करना चाहिए कि क्या उनके कार्य संवैधानिक शपथ से प्रेरित हैं और उनके द्वारा अपनाए गए कार्यों का तरीका संविधान के आदर्शों को आगे बढ़ाता है."


न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि राज्यपाल ने सद्भावना से काम नहीं किया, क्योंकि विधेयकों को राष्ट्रपति के पास भेजा गया, जबकि राज्यपाल स्वयं लंबे समय तक उन पर विचार करते रहे थे, तथा इन्हें पंजाब के राज्यपाल के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के तुरंत बाद राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखा गया था, जिसमें कहा गया था कि राज्यपाल विधेयकों पर विचार करके उन्हें वीटो नहीं कर सकते.


न्यायमूर्ति पारदीवाला द्वारा लिखे गए निर्णय में कहा गया कि संवैधानिक योजना के तहत "पूर्ण वीटो" या "पॉकेट वीटो" की कोई अवधारणा नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 200 के अनुसार, राज्यपाल से विधेयकों पर कार्रवाई के तीन तरीकों में से एक को अपनाने की अपेक्षा की जाती है - विधेयकों को स्वीकृति प्रदान करना, विधेयकों को स्वीकृति रोकना या विधेयकों को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना. न्यायालय ने माना कि विधेयक को केवल पहली बार में ही राष्ट्रपति के लिए आरक्षित किया जा सकता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP