छत्तीसगढ़ कोयला घोटाले में सुप्रीम कोर्ट ने जांच पर उठाए सवाल
SC ने औपनिवेशिक जांच पद्धतियों पर उठाये सवाल
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ कोयला लेवी मामले में जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान आपराधिक जांच और मुकदमों की पुरानी पद्धतियों पर सवाल उठाये. जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की बेंच ने व्यवसायी सूर्यकांत तिवारी की अंतरिम जमानत रद्द करने की छत्तीसगढ़ सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की.
सूर्यकांत तिवारी पर कोयला परिवहनकर्ताओं से कथित तौर पर उगाही और जिला खनिज निधि (डीएमएफ) धन के दुरुपयोग का आरोप है.
कोर्ट ने कहा कि आधुनिक वित्तीय अपराधों की जांच के लिये पुरानी पद्धतियां अप्रभावी हैं और केवल जेल भेजकर यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि आपराधिक कानून काम कर रहा है. जस्टिस बागची ने सवाल उठाया कि क्या गवाहों की सुरक्षा के लिये केवल जेल ही एकमात्र उपाय है और क्या राज्य ने गवाह संरक्षण योजना के लिये कोई संसाधन आवंटित किये हैं. उन्होंने कहा, "यह औपनिवेशिक मानसिकता है. क्या यह 18वीं सदी की जांच है?"
कोर्ट ने वित्तीय अपराधों की जांच के लिये फॉरेंसिक लेखाकारों और विशेषज्ञ जांचकर्ताओं की कमी पर भी चिंता जताई. जस्टिस बागची ने पूछा, "आपके पास आर्थिक अपराध शाखा है, लेकिन क्या आपके पास वित्तीय लेखाकार हैं? कल को डार्क वेब या क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े अपराध होंगे, आपकी क्षमता क्या है?"
राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने तिवारी को "आदतन अपराधी" और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बताते हुए दावा किया कि उन्होंने जेल से गवाहों को धमकाने की कोशिश की. दूसरी ओर, तिवारी के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उनके मुवक्किल तीन साल से अधिक समय से जेल में हैं और समान परिस्थितियों में अन्य आरोपियों को जमानत मिल चुकी है.
कोर्ट ने ट्रायल में देरी और विशेष अदालतों की कमी को भी रेखांकित किया. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कई राज्य वित्तीय संकट के कारण विशेष अदालतें स्थापित करने में असमर्थ हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है. कोर्ट ने डिजिटल साक्ष्य जैसे व्हाट्सएप चैट को मजबूत सबूत मानते हुए सीआरपीसी की धारा 164 के बयानों पर अत्यधिक निर्भरता को गलत ठहराया.
सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया.