SC ने छत्तीसगढ़ मामले में हत्या और हत्या के प्रयास के लिए दिशानिर्देश जारी किए
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को हत्या (आईपीसी धारा 300) और हत्या के प्रयास (आईपीसी धारा 307) के बीच अंतर करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए. यह फैसला छत्तीसगढ़ के एक मामले में आया, जहां कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि चिकित्सा उपचार से मृत्यु को रोका जा सकता था या नहीं, यह इस बात को निर्धारित करने में अप्रासंगिक है कि चोटें मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त थीं या नहीं.
जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने कहा कि अगर चोटें जानलेवा थीं और मृत्यु का इरादा था, भले ही मृत्यु बाद में जटिलताओं जैसे सेप्टीसीमिया के कारण हुई हो, तो यह आईपीसी की धारा 300 के तहत हत्या मानी जाएगी.
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर जटिलताएं चोटों का स्वाभाविक परिणाम हैं, तो हमलावर को जिम्मेदार ठहराया जाएगा, भले ही मृत्यु सीधे चोटों का परिणाम न हो.
यह मामला छत्तीसगढ़ से संबंधित है, जहां अपीलकर्ता और तीन अन्य लोगों ने पीड़ित के घर में घुसकर उसे छत पर खींच लिया, नीचे फेंक दिया और लाठियों व मुक्कों से हमला किया. पीड़ित लगभग नौ महीने तक गंभीर हालत में रहा और नवंबर 2022 में उसकी मृत्यु हो गई.
मेडिकल साक्ष्य में पुष्टि हुई कि मृत्यु रीढ़ की हड्डी की चोटों से उत्पन्न सेप्टिक शॉक, निमोनिया और मल्टी-ऑर्गन फेल्योर के कारण हुई.
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट के हत्या (धारा 302) के तहत दोषसिद्धि को बदलकर हत्या का प्रयास (धारा 307) कर दिया था, यह तर्क देते हुए कि मृत्यु नौ महीने बाद अपर्याप्त उपचार के कारण हुई.
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने कारण और प्रभाव के बीच की कड़ी को तोड़ने में "घोर त्रुटि" की.
सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश
*यदि चोट जानलेवा थी और मृत्यु का इरादा था, भले ही मृत्यु जटिलताओं के बाद हुई, तो यह धारा 300 के पहले हिस्से के तहत हत्या होगी.
*यदि चोटें अकेले मृत्यु का कारण बन सकती थीं और इरादा था, तो जटिलताओं के बाद भी मृत्यु धारा 300 के तीसरे हिस्से के तहत हत्या मानी जाएगी.
*यदि चोटें जानलेवा थीं, तो जटिलताओं के बाद मृत्यु धारा 300 के चौथे हिस्से के तहत हत्या होगी.
*चिकित्सा उपचार से मृत्यु को रोका जा सकता था या नहीं, यह अप्रासंगिक है.
*यदि जटिलताएं चोटों से उत्पन्न हुई हैं, तो हमलावर उत्तरदायी होगा.
*मृत्यु का इरादा दिखाने वाली संयुक्त चोटें, भले ही कोई एक चोट पर्याप्त न हो, हत्या के लिए पर्याप्त हो सकती हैं.
कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को कानूनी रूप से अस्थिर करार देते हुए ट्रायल कोर्ट की धारा 302 के तहत दोषसिद्धि को बहाल किया. कोर्ट ने कहा कि हमले की गंभीरता, इरादा और चोटों का प्रकार हत्या के लिए जिम्मेदारी को दर्शाता है, भले ही पीड़ित नौ महीने तक जीवित रहा.