सुप्रीम कोर्ट ने भूपेश बघेल और चैतन्य के मामले में क्या कहा ?
SC ने भूपेश बघेल और चैतन्य बघेल को HC जाने कहा
नई दिल्ली । डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तथा चैतन्य बघेल को हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके बेटे चैतन्य बघेल को निर्देश दिया कि वे कथित शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जांच और गिरफ्तारी के खिलाफ व्यक्तिगत राहत के लिये छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का रुख करें.
जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाला बागची की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट को उनके आवेदनों पर शीघ्र विचार करना चाहिये.
बघेल और उनके बेटे ने सुप्रीम कोर्ट में तीन याचिकाएं दायर कर मामले में कठोर कार्रवाई से सुरक्षा और मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधानों को चुनौती दी थी, जो प्रवर्तन निदेशालय की जांच, गिरफ्तारी और अभियोजन की शक्तियों से संबंधित हैं.
पीएमएलए प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के लिये, पीठ ने याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट में नई रिट याचिका दायर करने को कहा.
क्या क्या हुआ अदालत में
चैतन्य बघेल ने अपनी गिरफ़्तारी की ज़रूरत पर सवाल उठाया और छत्तीसगढ़ शराब 'घोटाले' से जुड़े ईडी/आर्थिक अपराध शाखा के मामले में अंतरिम ज़मानत, किसी भी तरह की ज़बरदस्ती कार्रवाई न करने की राहत मांगी. उन्होंने आर्थिक अपराध शाखा के एक मामले में भी ज़बरदस्ती कार्रवाई न करने की राहत मांगी और पीएमएलए की धारा 50 और 63 को चुनौती दी.
भूपेश बघेल ने कोयला घोटाला, शराब घोटाला, महादेव सट्टेबाजी ऐप, चावल मिलिंग और डीएमएफ घोटाला में दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा की माँग की. उनकी एक याचिका में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा दर्ज मामलों में राहत और पीएमएलए की धारा 44, 50 और 63 को चुनौती दी गई थी, जबकि दूसरी याचिका में सीबीआई और राज्य पुलिस द्वारा दर्ज मामलों में राहत की माँग की गई थी.
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची की पीठ ने दो वापस ली गई याचिकाओं का निपटारा कर दिया - चैतन्य बघेल और भूपेश बघेल की दूसरी याचिका (सीबीआई और राज्य पुलिस मामलों में राहत की मांग). न्यायालय ने दोनों को व्यक्तिगत राहत के लिए उच्च न्यायालय जाने की छूट दी और उच्च न्यायालय से शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किया.
इसके अलावा चैतन्य बघेल को पीएमएलए की धारा 50 और 63 को चुनौती देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक अलग रिट याचिका दायर करने की छूट दी गई. पीठ ने याचिका को यथास्थिति में स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि कानूनी चुनौती तथ्यों से बहुत अधिक उलझी हुई है.
भूपेश बघेल द्वारा दायर तीसरी याचिका को लंबित रखा गया और 6 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दिया गया, जब न्यायालय विजय मदनलाल चौधरी मामले के फैसले, जिसमें पीएमएलए के विभिन्न प्रावधानों को बरकरार रखा गया था, उसको चुनौती देने वाली याचिकाओं के समूह पर विचार करने वाला है.
तीसरी याचिका यानी पीएमएलए की धारा 44 को चुनौती देने वाली में भूपेश बघेल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि इस धारा का स्पष्टीकरण ईडी को किसी मामले में अंतहीन जाँच जारी रखकर शरारत करने की अनुमति देता है.
कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि चूँकि मजिस्ट्रियल निगरानी नहीं है, इसलिए ईडी किसी भी समय पूरक आरोपपत्र दाखिल करके अतिरिक्त आरोपियों को नामित कर सकता है. उन्होंने तर्क दिया कि इससे ईडी को डिफ़ॉल्ट ज़मानत प्रावधानों से बचने के लिए "टुकड़ों में आरोपपत्र" दाखिल करने और "आगे की जाँच" की आड़ में किसी भी समय अतिरिक्त आरोपियों को शामिल करने की अनुमति मिल जाती है.
इससे पहले अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने भूपेश बघेल की याचिका की विचारणीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें किसी भी मामले में तलब नहीं किया गया है और उनके खिलाफ कोई एफआईआर/ईसीआईआर भी दर्ज नहीं है.
वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा प्रस्तुत चैतन्य बघेल को पीएमएलए की धारा 50 और 63 को चुनौती देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक अलग रिट याचिका दायर करने की छूट दी गई. पीठ ने याचिका को यथास्थिति में स्वीकार करने से इनकार कर दिया.
जवाब में, न्यायमूर्ति बागची ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से कहा कि वह बयान दें कि पूर्व मुख्यमंत्री का इस जाँच से कोई संबंध नहीं है. जब ऐसा कोई बयान नहीं आया, तो न्यायाधीश ने टिप्पणी की, "तो आप स्पष्ट नहीं हैं. हम किसी नागरिक की स्वतंत्रता को इस हद तक नहीं छोड़ सकते कि उसे चुनौती देने का अधिकार है."
न्यायमूर्ति कांत ने यह भी कहा कि कोई भी नागरिक किसी भी प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दे सकता है.