क्या मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को 'अछूत' माना जा सकता है? SC
नई दिल्ली । डेस्क: उच्चतम न्यायालय में सबरीमाला मंदिर में प्रजनन आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को लेकर कानूनी बहस एक बार फिर तेज हो गई है. मंगलवार को नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने केंद्र सरकार के रुख पर कड़े सवाल उठाए.
उन्होंने पूछा कि क्या महिलाओं को उनके मासिक धर्म के दौरान तीन दिनों के लिए "अछूत" माना जा सकता है और क्या यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन नहीं है, जो अस्पृश्यता (छुआछूत) को प्रतिबंधित करता है.
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के उस फैसले को वापस लेने की वकालत की, जिसने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था.
मेहता ने दलील दी कि यह मामला छुआछूत का नहीं, बल्कि अनुच्छेद 26 के तहत "धार्मिक संप्रदायों" के अपने रीति-रिवाजों का पालन करने के मौलिक अधिकार का है.
उन्होंने तर्क दिया कि भगवान अयप्पा के अन्य सभी मंदिर महिलाओं के लिए खुले हैं, लेकिन सबरीमाला मंदिर की प्रकृति 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' की है, जो इसे एक अनूठा मामला बनाती है.
दिलचस्प बात यह है कि केरल की एलडीएफ सरकार ने भी इस मुद्दे पर केंद्र के सुर में सुर मिलाते हुए पिछले फैसले की समीक्षा की मांग की है.
हालांकि, जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि एक महिला के तौर पर वह इस वास्तविकता को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं कि मासिक धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ है. अदालत इस मामले पर अपनी सुनवाई गुरुवार तक जारी रखेगी.