क्या थरूर भाजपा में जायेंगे?
नई दिल्ली । डेस्क: कांग्रेस सांसद शशि थरूर के हालिया लेख और बयानों ने पार्टी के भीतर तूफान खड़ा कर दिया है. तिरुवनंतपुरम से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री थरूर ने अंतर्राष्ट्रीय मंच 'प्रोजेक्ट सिंडिकेट' पर एक लेख में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा 1975 में लागू आपातकाल की कड़ी आलोचना की है.
उन्होंने आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र का 'सबसे काला दौर' करार देते हुये संजय गांधी की भूमिका और जबरन नसबंदी नीति पर सवाल उठाये हैं. थरूर ने लिखा कि आपातकाल के दौरान लोकतंत्र के सभी स्तंभों को 'मौन' कर दिया गया था, नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ था.
इस लेख ने कांग्रेस के भीतर भूचाल ला दिया है. लोकसभा में कांग्रेस के व्हिप मणिकम टैगोर ने नाम लिये बिना थरूर पर तंज कसते हुए कहा, "जब कोई सहयोगी भाजपा की भाषा बोलने लगता है, तो लगता है कि वह तोता बन रहा है."
पार्टी के कई नेता थरूर के इस रुख से नाराज हैं, क्योंकि भाजपा लंबे समय से आपातकाल को 'संविधान हत्या' के रूप में प्रचारित कर रही है. 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाने की भाजपा की पहल ने इस मुद्दे को और हवा दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह जैसे भाजपा नेताओं ने इसे कांग्रेस के खिलाफ हमले का हथियार बनाया है.
थरूर का यह रुख नया नहीं है. वह पहले भी कई मौकों पर मोदी सरकार की नीतियों की तारीफ कर चुके हैं. हाल ही में 'ऑपरेशन सिंदूर' की प्रशंसा और आतंकवाद के खिलाफ भारत की 'जीरो टॉलरेंस' नीति को बढ़ावा देने के लिये पांच देशों के कूटनीतिक दौरे पर उनकी भूमिका को भाजपा नेताओं ने सराहा था.
इन घटनाओं ने कांग्रेस के भीतर थरूर की निष्ठा पर सवाल उठाये हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जैसे पवन खेड़ा, उदित राज और जयराम रमेश ने उनके बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है.
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस मुद्दे पर चुटकी लेते हुए कहा, "हमारे लिए देश पहले है, लेकिन कुछ लोगों के लिए मोदी पहले हैं. कोई भी अपनी मर्जी से कुछ भी लिख सकता है."
पार्टी सूत्रों का कहना है कि थरूर के लगातार पार्टी-विरोधी बयानों ने उनके भविष्य को लेकर अटकलों को जन्म दिया है. कई लोग मानते हैं कि वह जल्द ही भाजपा में शामिल हो सकते हैं. राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि थरूर के लिये कांग्रेस के दरवाजे अब पूरी तरह बंद हो सकते हैं.
इस बीच, थरूर के समर्थकों का कहना है कि वह केवल अपने विचार खुलकर व्यक्त कर रहे हैं और उनकी आलोचना तथ्यपरक है.
हालांकि, पार्टी के भीतर बढ़ता असंतोष उनकी स्थिति को और कमजोर कर रहा है. क्या शशि थरूर वाकई भाजपा की ओर कदम बढ़ायेंगे, या यह केवल अटकलों का दौर है? यह सवाल भारतीय राजनीति में अगले कुछ दिनों में जवाब की तलाश में है.