पति की कमाई ज्यादा होने पर भी आत्मनिर्भर पत्नी को गुजारा भत्ता नहीं: दिल्ली कोर्ट
नई दिल्ली । डेस्क: दिल्ली की एक अदालत ने गुजारा भत्ते को लेकर चल रहे एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की है. अदालत ने कहा है कि सिर्फ इसलिए कि पति की कमाई पत्नी से अधिक है, पत्नी को स्वतः ही अंतरिम गुजारा भत्ता पाने का अधिकार नहीं मिल जाता. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भूपिंदर सिंह ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया कि वित्तीय सहायता कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जो केवल दोनों पक्षों की आय के अंतर के आधार पर तय की जाए.
यह फैसला एक अलग रह रहे दंपती की ओर से दायर की गई क्रॉस-अपीलों पर आया है. इस मामले में पत्नी ने अपने लिए गुजारा भत्ते की मांग की थी, जबकि पति ने अपनी नाबालिग बेटी के लिए तय की गई गुजारा भत्ते की राशि को चुनौती दी थी. अदालत ने दोनों ही पक्षों की याचिकाओं को खारिज कर दिया.
अदालत ने पाया कि महिला अच्छी पढ़ी-लिखी है और हर महीने 60,000 रुपये से अधिक की नियमित और अच्छी आय कमा रही है, जो उसकी वित्तीय आत्मनिर्भरता को दर्शाता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब एक पत्नी खुद आर्थिक रूप से सक्षम हो, तो उसे अंतरिम गुजारा भत्ता देना कानूनी तौर पर अनिवार्य नहीं माना जा सकता.
इसके साथ ही, अदालत ने नाबालिग बेटी के लिए तय किए गए गुजारा भत्ते को कम करने की पति की मांग को भी सिरे से खारिज कर दिया. पूर्व में निचली अदालत ने पति को निर्देश दिया था कि वह याचिका दायर करने की तारीख से जनवरी 2021 तक 7,000 रुपये प्रति माह और फरवरी 2021 से याचिका के निपटारे तक 5% वार्षिक वृद्धि के साथ 14,000 रुपये प्रति माह का भुगतान करे.
पति का तर्क था कि चूंकि मां की आय अच्छी है, इसलिए बच्चे के लिए यह राशि अत्यधिक है. उसने यह सुझाव भी दिया कि इस पैसे को नियमित खर्च के बजाय बच्ची के भविष्य के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा किया जाना चाहिए.
अदालत ने पति के इस तर्क को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए कहा कि गुजारा भत्ते का मुख्य उद्देश्य बच्चे की वर्तमान और दैनिक जरूरतों को पूरा करना है. यदि इस राशि को भविष्य के लिए निवेश में लगा दिया जाएगा, तो बच्चे के भरण-पोषण का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा.
न्यायाधीश ने कहा कि एक बढ़ते बच्चे की जरूरतें केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि उसमें भोजन, कपड़े, स्वास्थ्य, परिवहन और अन्य दैनिक आवश्यकताएं शामिल होती हैं.
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि जो माता या पिता बच्चे को अपने पास रखते हैं, वे केवल पैसा ही नहीं बल्कि लगातार देखभाल और समय भी देते हैं. ऐसे में गैर-कस्टोडियल माता-पिता, विशेषकर जिनकी आय अधिक है, से अधिक वित्तीय योगदान की उम्मीद करना अनुचित नहीं है.
इसके अलावा, अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि बच्चे के गुजारा भत्ते के अधिकार को माता-पिता के बीच चल रहे मुलाकाती अधिकारों के विवाद से नहीं जोड़ा जा सकता.