सऊदी-हूती जंग: क्या मक्का रक्षा समझौते के तहत युद्ध में कूदेगा पाकिस्तान?
नई दिल्ली । डेस्क: यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के रणनीतिक और आर्थिक ठिकानों पर हालिया मिसाइल और ड्रोन हमलों ने मध्य पूर्व में तनाव को एक नए मोड़ पर खड़ा कर दिया है. रियाद हवाई अड्डे, ताइफ और लाल सागर स्थित प्रमुख तेल बंदरगाह यानबू को निशाना बनाए जाने के बाद यह संघर्ष अब सीधे सऊदी अरब के प्रमुख शहरों और ऊर्जा बुनियादी ढांचे तक पहुंच चुका है. इस बड़े सैन्य संकट ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल ही में हस्ताक्षरित 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' को महज छह सप्ताह के भीतर ही अपनी पहली सबसे बड़ी परीक्षा के सामने ला खड़ा किया है.
मक्का रक्षा समझौता और पाकिस्तान की भूमिका
नाटो की सामूहिक रक्षा धारा की तर्ज पर बने मक्का समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर हमला बाकी सभी पर हमला माना जाएगा. पाकिस्तान ने साफ कर दिया है कि वह इस समझौते को महज एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं मानता. पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने जोर देकर कहा है कि इस्लामाबाद सऊदी अरब के साथ राजनयिक और भौतिक, दोनों रूपों में खड़ा है.
पाकिस्तान के पास पहले से ही सऊदी अरब में लगभग 8,000 सैनिक, JF-17 लड़ाकू विमानों का एक स्क्वाड्रन, दो ड्रोन स्क्वाड्रन और HQ-9 वायु रक्षा प्रणाली तैनात है. यह पहले से मौजूद सैन्य उपस्थिति पाकिस्तान को आवश्यकता पड़ने पर तुरंत प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई में उतरने की स्थिति प्रदान करती है.
हूती विद्रोहियों की चेतावनी और इस्लामाबाद का धर्मसंकट
हूती नेतृत्व ने पाकिस्तान और तुर्की को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि वे इस संघर्ष में हस्तक्षेप करते हैं तो उन्हें भी गंभीर नतीजों का सामना करना पड़ेगा. यह चेतावनी इस्लामाबाद के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और सामरिक दुविधा पैदा करती है. एक तरफ सऊदी अरब को रक्षात्मक मदद देने से पाकिस्तानी बल सीधे हूती निशानों के दायरे में आ सकते हैं,
वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान को ईरान के साथ अपनी 900 किलोमीटर लंबी सीमा और तेहरान-वाशिंगटन के बीच मध्यस्थ की अपनी छवि को भी संतुलित रखना है. दूसरी ओर, तुर्की ने सीधे सैनिक भेजने के संकेत तो नहीं दिए हैं, लेकिन अपनी आधुनिक रक्षा तकनीक, ड्रोन और मिसाइल रोधी प्रणालियों के माध्यम से रियाद को तकनीकी सहायता देने का आश्वासन दिया है.
सऊदी नेतृत्व पर दबाव और घटते वायु रक्षा संसाधन
यमन के भीतर हूती विद्रोहियों ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण मोचा बंदरगाह और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा जमा लिया है, जिससे सऊदी अरब को युद्ध के मैदान में बड़ा झटका लगा है. लगातार हो रहे हवाई हमलों के कारण सऊदी अरब के मिसाइल इंटरसेप्टर और वायु रक्षा संसाधनों का भंडार तेजी से घट रहा है, जिसके चलते रियाद अपने मित्र देशों से तत्काल सहायता की उम्मीद कर रहा है.
घरेलू स्तर पर भी इन सैन्य विफलताओं और तेल बुनियादी ढांचे को पहुंचे नुकसान के कारण क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की सुरक्षा रणनीति और आर्थिक नीतियों पर सवाल उठने लगे हैं.
भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव
इस क्षेत्रीय संघर्ष का सीधा और प्रतिकूल प्रभाव भारत की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ रहा है. लाल सागर मार्ग और यानबू बंदरगाह पर हमलों के कारण सऊदी अरब से भारत आने वाले कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हुई है. जुलाई के आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा सऊदी अरब से आता है.
होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर के व्यापारिक मार्गों पर बढ़े खतरे ने कच्चे तेल की कीमतों, माल ढुलाई दरों और बीमा लागतों को बढ़ा दिया है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मुद्रास्फीति और महंगे आयात की गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है.