शोध में खुलासा: जीरो ग्रेविटी में रास्ता भटक जाते हैं शुक्राणु
नई दिल्ली । डेस्क: हाल ही में हुए एक वैज्ञानिक शोध ने अंतरिक्ष यात्रा और भविष्य में अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने की मानवीय कल्पनाओं के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है. ऑस्ट्रेलिया की एडिलेड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन के अनुसार, अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने या शून्य गुरुत्वाकर्षण के संपर्क में आने से पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
वैज्ञानिकों ने पाया कि गुरुत्वाकर्षण की अनुपस्थिति में शुक्राणु (स्पर्म) अपनी दिशा खो देते हैं और लक्ष्य तक पहुँचने में असमर्थ हो जाते हैं.
इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर ही '3D क्लिनोस्टेट' नामक यंत्र की मदद से कृत्रिम शून्य गुरुत्वाकर्षण का वातावरण तैयार किया. इसमें इंसान, सूअर और चूहों के शुक्राणुओं पर परीक्षण किया गया.
परिणामों में देखा गया कि जीरो ग्रेविटी में शुक्राणु ठीक उसी तरह व्यवहार करते हैं जैसे किसी व्यक्ति की आँखों पर पट्टी बाँधकर उसे छोड़ दिया गया हो. वे किसी निश्चित दिशा में आगे बढ़ने के बजाय गोल-गोल घूमने लगते हैं या अपनी ही पूंछ का पीछा करने लगते हैं.
शोधकर्ताओं ने मादा प्रजनन नली जैसी एक कृत्रिम प्रणाली तैयार की थी, जिसमें देखा गया कि गुरुत्वाकर्षण होने पर शुक्राणु आसानी से अंडे तक पहुँच गए, लेकिन जीरो ग्रेविटी में वे पूरी तरह दिशाहीन और भ्रमित हो गए.
अध्ययन का नेतृत्व करने वाली निकोल मैकफर्सन ने बताया कि शून्य गुरुत्वाकर्षण में रहने के मात्र 4 से 6 घंटों के भीतर ही प्रजनन क्षमता में गिरावट शुरू हो सकती है.
हालांकि शुक्राणुओं की शारीरिक बनावट या उनकी गति में कोई कमी नहीं आती, लेकिन वे अंडे तक पहुँचने के लिए जरूरी सही मार्ग का चुनाव नहीं कर पाते.
वैज्ञानिकों का मानना है कि गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण शुक्राणु प्रजनन मार्ग की दीवारों को महसूस नहीं कर पाते, जिससे वे रास्ता भटक जाते हैं. यह शोध भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों और दूसरे ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं को लेकर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.