रेयर अर्थ मिनरल ने बदली दुनिया की अर्थव्यवस्था
रेयर अर्थ मिनरल: विश्व अर्थव्यवस्था का आधार
नई दिल्ली । डेस्क: रेयर अर्थ मिनरल आज विश्व अर्थव्यवस्था का आधार बन गया है जिसमें चीन अग्रणी है. आज के युग में, जहां स्मार्टफोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी), और रक्षा उपकरण हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं, इनके पीछे एक अनदेखी ताकत काम करती है रेयर अर्थ मिनरल (रेयर अर्थ एलिमेंट्स, REEs). ये 17 धात्विक तत्व, जिनमें लैंथेनाइड्स, स्कैंडियम और येट्रियम शामिल हैं, आधुनिक तकनीक और उद्योगों की रीढ़ हैं.
ये खनिज न केवल इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल में, बल्कि विंड टर्बाइन, एमआरआई मशीनों, और यहां तक कि कैंसर की दवाओं में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. आश्चर्यजनक रूप से, विश्व के 90% से अधिक रेयर अर्थ मिनरलों का खनन और प्रसंस्करण चीन में होता है.
रेयर अर्थ मिनरल क्या हैं?
रेयर अर्थ मिनरल 17 धातुओं का समूह हैं, जिनमें लैंथेनम, सीरियम, प्रासियोडिमियम, नियोडिमियम, और येट्रियम जैसे तत्व शामिल हैं. इनका नाम "दुर्लभ" होने के बावजूद, ये तांबे या जस्ते जितने ही सामान्य हैं. इनकी दुर्लभता का कारण इनका खनन और प्रसंस्करण है, जो बेहद जटिल और श्रमसाध्य प्रक्रिया है.
ये खनिज पृथ्वी की सतह पर बिखरे हुये हैं, और केवल विशेष परिस्थितियों में, जैसे अत्यधिक अम्लीय वातावरण में, ये एक जगह एकत्रित हो पाते हैं. फिर भी, इन्हें निकालना और शुद्ध करना अत्यंत कठिन है.
उदाहरण के लिए, ब्राजील, जिसके पास विश्व का दूसरा सबसे बड़ा रेयर अर्थ मिनरल भंडार 2.1 करोड़ मीट्रिक टन का है, ने 2024 में केवल 20 मीट्रिक टन खनिज का उत्पादन किया. वहीं, चीन ने उसी वर्ष 2.7 लाख मीट्रिक टन का खनन किया. यह अंतर खनन की जटिलता और संसाधनों की कमी को दर्शाता है.
इनका उपयोग कब शुरू हुआ?
रेयर अर्थ मिनरलों की खोज 18वीं और 19वीं शताब्दी में हुई थी. इनका पहला व्यावसायिक उपयोग 1880 के दशक में गैस मेंटल्स के उत्पादन में हुआ.
1960 के दशक में रंगीन टेलीविजन सेट्स की शुरुआत के साथ इनका व्यापक उपयोग शुरू हुआ, जिसने इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में क्रांति ला दी.
चीन कैसे बना प्रमुख उत्पादक?
1960 के दशक में, जब इन खनिजों का व्यावसायिक उपयोग शुरू हुआ, तब कैलिफोर्निया में इनका खनन प्रमुखता से होता था. लेकिन खनन की प्रक्रिया पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती थी और श्रम-गहन थी. अमरीका में सख्त पर्यावरण नियमों के कारण 2002 तक वहां का माउंटेन पास खनन बंद हो गया. दूसरी ओर, चीन में कम मजदूरी और कमजोर श्रम कानूनों ने इसे खनन के लिए आदर्श बनाया. साथ ही, चीन के पास विश्व का सबसे बड़ा रेयर अर्थ मिनरल भंडार भी था. 1993 में चीन विश्व का 38% REE उत्पादन करता था, जबकि अमरीका 33%. लेकिन 2000 तक चीन ने 95% से अधिक उत्पादन पर कब्जा कर लिया और 2011 तक यह आंकड़ा 97% तक पहुंच गया.
इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग पर प्रभाव
रेयर अर्थ मिनरल इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) उद्योग के लिये अपरिहार्य हैं, जिसका वैश्विक बाजार मूल्य लगभग 671.47 अरब डॉलर है. इन खनिजों से बने मैग्नेट, जो वाहन की लागत का केवल 5% हिस्सा होते हैं, ईवी मोटर और स्टीयरिंग सिस्टम के लिए अनिवार्य हैं. अप्रैल 2025 में, अमरीका के साथ व्यापारिक तनाव के बीच, चीन ने सात प्रमुख REEs के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया, जो ऑटोमोबाइल और रक्षा क्षेत्रों में उपयोग होते हैं.
क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रतिबंध के कारण भारतीय ऑटोमोबाइल निर्माताओं के पास केवल चार से छह सप्ताह का दुर्लभ पृथ्वी मैग्नेट का भंडार बचा है. यदि यह स्थिति लंबी चली, तो जुलाई 2025 से वाहन उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे ईवी मॉडल्स की डिलीवरी में देरी हो सकती है.
भारत की रणनीति
इस संकट से निपटने के लिए भारत सरकार और ऑटोमोबाइल निर्माता दो स्तरों पर काम कर रहे हैं. अल्पकालिक रणनीति में वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से संपर्क, रणनीतिक भंडारण, और उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन योजनाओं के तहत घरेलू असेंबली को बढ़ावा देना शामिल है. दीर्घकालिक रणनीति के तहत आयात निर्भरता को कम करने का है, जिसमें तेजी से REE खनन, स्थानीय उत्पादन क्षमता का निर्माण, और रीसाइक्लिंग ढांचे में निवेश शामिल है.
रेयर अर्थ मिनरल आधुनिक तकनीक और वैश्विक अर्थव्यवस्था का आधार हैं. चीन का इस क्षेत्र में प्रभुत्व और हाल के निर्यात प्रतिबंधों ने आपूर्ति श्रृंखला के जोखिमों को उजागर किया है. भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर है कि वे अपनी खनन और प्रसंस्करण क्षमता को बढ़ाएये, ताकि भविष्य में तकनीकी और आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके.