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छत्तीसगढ़ के USTR में दिखे दुर्लभ 'ढोल'

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02 जुल. 2026, 01:27 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

ढोल
ढोल

धमतरी । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के वन्यजीव प्रेमियों और विशेषज्ञों के लिए एक बेहद उत्साहजनक खबर सामने आई है. राज्य के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में भारतीय जंगली कुत्तों का एक झुंड देखा गया है, जिन्हें स्थानीय और वैज्ञानिक भाषा में 'ढोल' (Dhole) कहा जाता है.


अखिल भारतीय बाघ अनुमान (AITE) 2026 अभियान के तहत रिजर्व में लगाए गए ट्रैप कैमरों ने चार ढोल के इस झुंड को अपनी तस्वीरों में कैद किया है. वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, इस दुर्लभ प्रजाति का दिखना इस बात का सीधा संकेत है कि रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण के प्रयास सफल हो रहे हैं और वहां का पारिस्थितिक तंत्र लगातार मजबूत हो रहा है.

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पारिस्थितिक संतुलन के लिए बेहद जरूरी


ढोल भारत के सबसे दुर्लभ और अनूठे मांसाहारी जीवों में से एक हैं. यह प्रजाति अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में 'गंभीर रूप से लुप्तप्राय' (Critically Endangered) श्रेणी में शामिल है. साथ ही, इन्हें वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत देश में सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्राप्त है.


ये जंगली कुत्ते मुख्य रूप से झुंड में शिकार करने के लिए जाने जाते हैं और इन्हें दुनिया के सबसे कुशल शिकारी पैक्स में से एक माना जाता है. रिजर्व के अधिकारियों के मुताबिक, ढोल की मौजूदगी से जंगल में चीतल, सांभर और जंगली सूअर जैसे शाकाहारी जीवों की आबादी नियंत्रित रहती है. इससे जंगलों में वनस्पतियों को पनपने और प्राकृतिक पुनर्जन्म (Natural Regeneration) में बड़ी मदद मिलती है.


संरक्षण प्रयासों का दिखने लगा असर


उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर वरुण जैन ने इस कामयाबी पर खुशी जताते हुए कहा कि किसी भी जंगल की सेहत सिर्फ बाघों की मौजूदगी से नहीं, बल्कि पूरी खाद्य श्रृंखला (Food Chain) और जैव विविधता के संतुलन से मापी जाती है. संकटग्रस्त ढोल के संगठित झुंड का कैमरों में कैद होना यह साबित करता है कि रिजर्व में किए जा रहे संरक्षण कार्य सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.


वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में रिजर्व के भीतर बड़े पैमाने पर काम किया गया है. लगभग 956 हेक्टेयर वन भूमि को अवैध कब्जों से मुक्त कराकर वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और गलियारों (कॉरिडोर) को बहाल किया गया है. 


इसके अलावा, शिकार विरोधी अभियानों को कड़ा करते हुए 550 से अधिक शिकारियों और वन्यजीव अपराधियों को गिरफ्तार किया गया है. लगातार गश्त, कैमरा ट्रैप निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से इस क्षेत्र की जैव विविधता में यह बड़ा सुधार देखने को मिला है.


'व्हिसलिंग हंटर्स' के नाम से हैं मशहूर


मूल रूप से दक्षिण, मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाए जाने वाले ढोल एक बेहद सामाजिक और शीर्ष शिकारी (Apex Predator) जीव हैं. अपने आकर्षक लाल-भूरे रंग के फर और खास समूह गतिशीलता के लिए पहचाने जाने वाले इन जीवों को 'व्हिसलिंग हंटर्स' (सीटी बजाने वाले शिकारी) भी कहा जाता है, क्योंकि ये शिकार के दौरान एक-दूसरे से संपर्क साधने के लिए सीटी जैसी तीखी आवाजें निकालते हैं. 


मध्यम आकार के इन कैनिड्स (कैनिडे परिवार के जीव) का वजन करीब 10 से 21 किलोग्राम के बीच होता है और इनके मुंह में 40 दांत होते हैं. अपनी बेजोड़ ताकत, सहनशक्ति और बेहतरीन टीम वर्क के दम पर ये अपने से कई गुना बड़े शिकार को भी थकाकर गिरा देने की क्षमता रखते हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP