मौलिक, प्रखर लेकिन विवादग्रस्त (?) लोहिया
राममनोहर लोहिया होने का मतलब
कनक तिवारी
बीसवीं सदी के भारत का इतिहास सबसे ज़्यादा घटना प्रधान हुआ है. इसी सदी में नवोदय या नवजागरण काल परवान चढ़ा और इसी सदी ने स्वाधीन भारत को जन्म दिया. इसी सदी में निर्वाचित करीब तीन सौ प्रतिनिधियों द्वारा विदेशों, मुख्यतः यूरो-अमेरिकी देशों से प्रभावित सामूहिक लेखन के जरिए संविधान रचा गया. नए बौद्धिक आयामों के प्रतिमानों से लकदक संसद, योजना आयोग, हरित क्रांति, श्वेत क्रांति, चुनाव, आणविक ऊर्जा, विदेश नीति, औद्योगीकरण वगैरह के जरिए भारत धीरे धीरे इक्कीसवीं सदी में वैश्वीकरण के युग में ला ही दिया गया है.
विवेकानन्द, तिलक, गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष बोस, सरदार पटेल, जिन्ना, मौलाना आज़ाद, जयप्रकाश नारायण, इंदिरा गांधी, राजेन्द्र प्रसाद और डाॅ. राममनोहर लोहिया जैसे शीर्ष स्वतंत्रता संग्राम के नेता भारत के भविष्य का जन-चरित्र लिखने की कोशिशें करते रहे हैं. इनमें लोहिया और गांधी ने भारत के सत्ताधीश रहे इंग्लैंड से सीधी मुठभेड़ करते न केवल अपने सवालों के उत्तर खुद ढूंढ़े, बल्कि पश्चिमी नस्ल की शैतानियत का मुखौटा नोचकर फेंक दिया. लोहिया ने भी यूरो-अमेरिकी कई प्रजातांत्रिक देशों से जो उम्मीदें बांध रखी होंगी, वे गहरी निराशा में तब्दील हुईं.
लोहिया की शख्सियत कई नेताओं से जुदा और उनके समानान्तर बहुआयामी रही है. तिलक, गांधी, नेहरू और मौलाना आजा़द जैसे शीर्ष नेता भी बहुमुखी प्रतिभा के हैं. तिलक में पुरातन संस्कारों और आदर्शों के महिमामंडन के साथ ही उनके पुनर्मूल्यांकन का लगातार आग्रह है. गांधी को तिलक के बनिस्बत अतीत के युग-मूल्यों की अप्रासंगिकता पर भी विचार करने से परहेज नहीं है. उन्होंने अपने विचारों में इस्लाम तथा ईसाइयत के भी कई मूल्य अपनाए. नेहरू मोटे तौर पर आधुनिक पश्चिमी सभ्यता के नज़रिए से भी सरोकार रखते अपनी नायाब अतीत दृष्टि से नया भारत-बोध तराशने के शिल्पकार थे. उम्र के लिहाज से लोहिया इन सबके कनिष्ठ रहने के बावजूद उनके प्रभामंडल से बार बार छिटककर मौलिक अवधारणाएं और रास्ते गढ़ते रहे.
वे ज़्यादातर अपनी बनाई समानान्तर वैचारिक पगडंडी पर ‘एकला चलो‘ कहते चलते रहे. उस जनपथ पर अवाम चल नहीं पाया अन्यथा लोकतांत्रिक मंज़िल तक जा सकता था. लोहिया पर इतिहास ने भी अपनी नज़र संतुलित और आनुपातिक आधार पर नहीं डाली है. कई बौद्धिकों का उत्तर-गांधी युग में असाधारण प्रभाव अनदेखा हो गया है. उनकी इंद्रधनुषी शख्सियत का वस्तुपरक, तटस्थ और उर्वर आलोचनात्मक मूल्यांकन होना अब भी अधूरा है. उनमें लोहिया को समझने की जुगत करना बीसवीं सदी में इतिहास और देशज परंपराओं सहित अधुनातन पश्चिमी विचार को खंगालने के संयुक्त साहसिक उपक्रम का एडवेंचर हो सकता है.
राममनोहर लोहिया ने जनक्रांतिधर्मी जीवन जिया, लेकिन शायद डाॅक्टरी लापरवाही के कारण सत्तावनवें वर्ष में अकाल मौत पाई. उनका संक्षिप्त जीवन इतिहास का धधकता दस्तावेज हुआ. गांधी तथा मार्क्स चिंतन से दीक्षित क्रांतिकारियों जैसा ओजमय साहस, संस्कृति के आयामों की खोजी लेकिन बौद्धिक मौलिकता सहेजे लोहिया आज़ादी के लिए जद्दोजहद करते देश के अवाम के लिए सिद्धांतों और कर्म के अग्निमय नायक हुए. वे शोषितों के प्रवक्ता, अन्यायी, विदेशी तथा भारतीय हुकूमतशाही के विरोधी और गांधी की तरह निहायत मामूली और गरीब आदमी के प्रतिनिधि-प्रतीक हो गए. मौलिक अवधारणाएं लिए मुक्त मानव के मसीहा लोहिया अंतरराष्ट्रीय समस्याओं की बारीकियों और सांख्यिकी की शोधपूर्ण जानकारियों से लैस होकर सामाजिक-राजनीतिक मंच पर जीवन्त रहे. उनकी गैरमौजू़दगी में राजनीतिक चिंतन समाजविमुख और समाजवादी आंदोलन स्पंदनहीन हो गया दीखता है.
स्वतंत्र होने जा रहे भारत में साधारण नागरिक का उदासीन अजनबीपन खत्म कर उसकी आत्मा को देश के अस्तित्व के साथ तादात्म्य करने की जोरदार कोशिश ने लोहिया को राजनीति में सबसे ज्यादा नई राहें तोड़ने मजबूर किया. उनका जीवन गूढ़ और गोपनीय बना दिए जाते सियासी मसलों को भी अवाम की बहस मुबाहिसे के चौपाल में डाल देने की लगातार कोशिशों का सबूत है.
लोहिया के लिए राजनीति का खुला आसमान था. फिर भी संस्कृति, साहित्य, धर्म, दर्शन, इतिहास, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान अर्थात मनुष्य का बहुविध अस्तित्व ही उनके दायरे में था. प्रख्यात अंग्रेज दार्शनिक, लेखक, विधिवेत्ता बेकन की तरह लोहिया घोषणा करते थे-. All Knowledge is my province यह कि पूरा ज्ञान लोक मेरी चिन्तन परिधि में है. मौलिक चिंतक होने के साथ साथ लोहिया ताजिन्दगी अतुलनीय लगन के साथ अपने आश्वस्त आदर्शों को साकार करने की दिशा में लगातार परेशानदिमाग भी रहे. आज़ाद हिन्दुस्तान में उनसे बड़ा सेनापति लगता जनसैनिक ढूंढ़ने से भी नहीं मिलता. उनके जाते जाते देश ने संघर्षधर्मी जनचेतना के सबसे जानदार सिपहसालार के रूप में उन्हें स्वीकारा भी.
मौलिकता के प्रति लोहिया का आग्रह और चिंतन मूलतः आज़ाद होते भारत में औसत नागरिक का देश के साथ तादात्म्य खोजने की कशिश के कारण था. यही कारण है जयप्रकाश नारायण की तरह लोहिया गांधी जी की ओर आकर्षित हुए. इसके बरक्स उनमें कम्युनिस्टों और किताबी गालबजाऊ समाजवादियों से एक तरह का अलगाव बढ़ता गया. उनकी अवधारणाओं से अलग हटकर लोहिया ने नए किस्म के मैदानी प्रयोग भारत की सामाजिक और सड़क आन्दोलनों की संरचना को लेकर किए थे. यही कारण है बाद के वर्षों में सभी प्रमुख उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की मांग को तरजीह नहीं देते लोहिया ने एक नया वैचारिक मोड़ देते मांग की जिसका नाम था ‘‘दाम बांधो.‘‘ प्रत्येक व्यक्ति को उत्पादन के दाम से ज्यादा से ज्यादा डेढ़ गुना दरों पर वस्तु उपभोक्ता के रूप में पाने का अधिकार होना चाहिए.
लोहिया ने इसी दलील के भी चलते इतिहास प्रसिद्ध अपना भाषण लोकसभा में दिया था. जब उन्होंने कहा था कि 27 करोड़ भारतीयों की औसत दैनिक आमदनी केवल 3 आना है. पूरे का पूरा सरकारी सरंजाम सकते में आ गया था. जवाहरलाल नेहरू ने भी बहुत कोशिश की होगी लेकिन प्रधानमंत्री की उंगलियां इस विवाद में उलझने के कारण जल सकती थीं. उन्होंने इस विवाद में पड़कर इसे आगे तूल देना मुनासिब नहीं समझा. लोहिया ने आश्वस्त होकर समझ लिया था कि राष्ट्रीयकरण कर दिए जाने से भी देश के सभी प्राकृतिक स्त्रोतों पर तिकड़मबाज अंगरेजियत हांकते ‘एलीट‘ क्लास का ही कब्जा हो जाएगा. उससे आम लोगों का कोई भला नहीं हो सकेगा.
मसलन एक ओर गांधी ने खादी, दांडी मार्च, चरखा और चंपारण सत्याग्रह वगैरह की युक्तियों की वजह से अपने आपको योद्धा संत राजनीतिज्ञ की श्रेणी में ऊर्ध्व गति से लाकर खड़ा कर दिया था. उसके बरक्स लोहिया ब्रिटिश मूर्तियों को तोड़ो या अंगरेजी हटाओ या दाम बांधो में तरह तरह के कई राजनीतिक नारों को देते स्थायित्व हासिल नहीं कर पाए. लोगों को उनके आह्वान में भी कुछ न कुछ शगल, मनोरंजन या विध्वंस भी नजर आता रहा.
फिर भी लोहिया पढ़े लिखे शीर्ष राजनीतिज्ञ से कहीं ऊपर मौलिकता के मनुष्य प्रतिष्ठान की तरह थे. उनसे मिलने से अखबारों को अगले दिन की सुबह के लिए हेडलाइन मिल जाती थी, क्योंकि लोहिया हर बार अनोखा, नया, अप्रत्याशित और मौलिक कह सकने की रणनीति बनाने की रचना की क्षमता और विश्वास रखते थे. उनकी असफलता का एक कारण और भी था. भारत जैसे बड़े देश में ढीले ढाले लोकतंत्र में मायूस और पस्तहिम्मत फितरत के लोगों का बहुमत है. वहां मौखिक रूप से अहिंसक कहलाती क्रांति को लोहिया कुछ ऐसे उग्र तरीकों से लाना चाहते थे जो ऊपरी तौर पर लोगों को हिंसक दिखाई देते थे.
छात्रों को सीधी मुठभेड़ के लिए कहना, चुनाव के समय शक्ति प्रदर्शन करना और कई मुद्दों पर पिकेटिंग करना वगैरह झटपट गतिविधियों, हरकतों या लाक्षणिकताओं के चलते लोहिया कोई सुव्यवस्थित तरीके या ऑर्गेनिक विकास के जरिए परिणामयुक्त रणनीति का प्रदर्शन नहीं कर सके. अपने जीवनकाल में पूरे विपक्षी दलों में लोहिया ही सबसे मुख्य और आकर्षक चेहरा थे जिनसे भविष्य के इतिहास को उम्मीदें बंधती थीं.
लोहिया को समझने की कोशिश
भारतीय जीवन की बीसवीं शताब्दी उसके इतिहास की सबसे ज्यादा घटना प्रधान रही है. इस सदी में भारतीय नवोदय या नवजागरण काल परवान चढ़ा और उसने अंततः एक स्वाधीन भारत को जन्मते देखा. इसी सदी में इस देश ने पहली बार सामूहिक लेखन के जरिए अपना संविधान रचा और देश को अनेक नए बौद्धिक आयामों से सींचा. संसद, योजना आयोग, हरित क्रांति, श्वेत क्रांति, चुनाव, आणविक ऊर्जा, विदेश नीति, औद्योगीकरण वगैरह के रास्तों पर चलकर भारत वैश्वीकरण के युग में आ पहुंचा या लाया गया.
बीसवीं सदी ने ही महान जननायकों से सहकार किया. विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, मोहम्मद अली जिन्ना, मौलाना आजाद, जयप्रकाश नारायण, इंदिरा गांधी, सरोजिनी नायडू और डाॅ. राममनोहर लोहिया जैसे अनेक जननायक बीसवीं सदी के प्रांगण में भारत का इतिहास समृद्ध करने की अपनी कोशिशें करते रहे. इनमें से विवेकानंद और लोहिया ने मौजूदा दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमेरिका से सीधा साक्षात्कार करने की कोशिश की और अपने सवालों का खुद ही उत्तर ढूंढ़ा. विवेकानंद शुरुआत में अमेरिका से प्रभावित थे. उन्होंने अमेरिका की आजादी के दिन अर्थात चार जुलाई पर एक कविता भी लिखी. वह चार जुलाई अंततः उनके निधन का दिवस हो गई. लोहिया ने भी अमेरिका जैसे शक्तिशाली लेकिन प्रजातांत्रिक देश से कई उम्मीदें बांध रखी थीं जो गहरी निराशा में तब्दील हुईं.
लोहिया एक बहुआयामी व्यक्ति थे. बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि हर व्यक्ति बहुआयामी ही होता है. उसके एक हिस्से पर प्रकाश डालने से वह उस व्यक्ति का सांकेतिक परिचय भर होता है, आकलन नहीं. भारतीय राजनीति के सिरमौर तिलक, गांधी और नेहरू जैसे लोग और मौलाना आजाद भी अद्भुत बौद्धिक प्रतिभा के धनी थे. तिलक में प्राचीन भारतीय संस्कारों और आदर्शों के महिमामंडन और पुनर्मूल्यांकन का लगातार आग्रह था. गांधी इसके बरक्स प्राचीन मूल्यों की अप्रासंगिकता पर विचार करने से परहेज नहीं करते थे. उन्होंने ईसाइयत के बहुत से मूल्यों को अपनाया भी. नेहरू में पश्चिमी दृष्टि के कारण एक नए भारत के तराशने का आग्रह था.
डाॅ. राममनोहर लोहिया इन तमाम महत्वपूर्ण विचारकों के साथ चलते हुए भी कभी कभी उनसे छिटक जाते हैं. वे जिस पगडंडी पर चलते हैं, वह उनकी स्वतः की निर्मिति होती है. लोहिया के साथ दिक्कत यह है कि उन पर पश्चातवर्ती भारतीय इतिहास ने अपनी नजर ठीक से नहीं डाली. बौद्धिकों में उनका असाधारण प्रभाव था लेकिन इसके बावजूद अब तक उनके इंद्रधनुषी व्यक्तित्व का विस्तृत आलोचनात्मक अध्ययन उपलब्ध नहीं है. लोहिया को समझने की कोशिश करना कम से कम बीसवीं सदी के ताजा इतिहास और सर्वज्ञात भारतीय ऋषि परंपराओं सहित अधुनातन पश्चिमी विचार को खंगालने के साहसिक उपक्रम के बराबर है.
राजनीति को लोहिया का अवदान महत्वपूर्ण होने पर भी भारत के लिए कई अर्थों में निर्णायक नहीं हो पाया. कई अर्थों में, कई कारणों से, वह हो भी नहीं सकता था. लोहिया के चिंतन में व्यावहारिक उपादेयता के साथ साथ यूटोपिया के अंश भी थे, जो इस जननेता को यथार्थ की धरती पर खड़ा हुआ देखने के बाद भी उसे स्वप्न महल निर्मित करना समझाते थे. राजनीति एक ठर्र किस्म की मानवीय प्रक्रिया भारतीय समाज में समझी जाती है जिसका मकसद सत्ता की कुर्सी पर बैठकर ऐंठना, इतराना और अजीर्ण होने तक लूट खसोट करना है. उत्तर-गांधी युग में लगातार यही हुआ है. भारतीय जनजीवन के बहुत से बड़े हस्ताक्षर इसलिए इस भूल भुलैया में आज भी फंसे हुए हैं.
कोल्हू के इन बैलों को लगता है कि वे लक्ष्य की ओर चल रहे हैं जबकि वे उसी जगह घूमते हुए जिन्सों से तेल उद्योगपतियों के लिए पेर रहे हैं और जिन्सों से बची हुई खली, भूसी, चूनी और चारा वगैरह आंख पर पट्टी बांधकर खा रहे हैं. जनता इन नेताओं को यह सब करने से रोक भी नहीं पाती है क्योंकि वह तो चुनावों के बाद नए नेताओं को चुन लेने को ही लोकतंत्र का पर्याय मानती है. इन तथाकथित जननेताओं में भद्र सामंती आचरण से लेकर बाजारू प्रवृत्तियां भी दिखाई पड़ती हैं लेकिन उनमें उस मानवीय, शैक्षिक, कलात्मक, सांस्कृतिक लक्षण का अभाव होता है जिसके कारण ही कोई देश अपने पाथेय तक पहुंचने की कोशिश करता है.
लोहिया मानव-संस्कृति के मूर्तिमान संस्करण थे. राजनीति तो उनके लिए संयोग, मजबूरी या बाद में प्रतिबद्धता हो गई थी. अपने सभी संभावित आयामों में किसी के हस्तक्षेप के बिना जी लेना ही तो जीवन जीना होता है. लोहिया इसलिए अपने एक निबंध के शीर्षक की तरह मर्यादित, उन्मुक्त और असीमित व्यक्तित्व लिए जीते रहे. उन्हें जीवन ने अपनी मर्यादा से रचा था लेकिन जीवन ने ही उनमें उन्मुक्ति की चाह पैदा की और उन्हें असीमित बनाया. धर्म को इस देश का प्राण बताने वाले साधु संत प्रयाग के कुंभ में लोगों को अपने प्रवचनों की घुट्टियां पिलाकर पुनर्जन्म और पाप पुण्य के चोचलों में उलझा रहे थे. तब उन्हें स्तब्ध करते हुए लोहिया ने अपना प्रसिद्ध भाषण दिया था कि धार्मिक समागम को चाहिए कि वह गंगा और यमुना सहित भारत की नदियों को साफ करे. इससे बड़ा और कोई धर्म नहीं हो सकता.
उन्होंने बताया कि देश का औद्योगिक कचरा, कारखानों और अस्पतालों तक का प्रदूषित जल नदियों में ज़हर की तरह घुल रहा है. भारत के सांस्कृतिक इतिहास की कोषिकाएं बनीं ये नदियां मृत्यु के उपरांत भले ही वैतरणी बनकर मोक्ष दिला दें, लेकिन फिलहाल तो ये खुद ही लाचारी के नाबदानों की तरह हैं. यह आश्चर्य है कि धार्मिक संतों के जमावड़े के अतिरिक्त भारत के राजनीतिक गलियारों में भी इस राष्ट्रीय कर्तव्य की कौंध नहीं थी. यह महत्वपूर्ण है कि भारतीय संसद तक को इस संबंध में वह कर्तव्य-बोध नहीं था जो लोहिया के गतिशील सामाजिक मानस में समा गया था और जिसकी भित्ति पर लोहिया ने धर्म के आडंबरों, चोचलों और पारंपरिक कुंभ की प्रकृति के महत्वपूर्ण सम्मेलन को अपने अग्रगामी सोच के जरिए संबोधित किया था.
ऐसा लगता है कि अपनी सामाजिक और वैधानिक जिम्मेदारियों को बूझने के बाद संसद ने अंततः जल प्रदूषण अधिनियम, 1974 में वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम, 1981 में और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 में अधिनियमित किया. इस तरह लोहिया ने धर्म और संस्कृति के गहरे सामासिक संबंधों की उदात्तता से एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कर्तव्यबोध निर्मित किया. यदि वे जीवित रहते तो पर्यावरण संरक्षण को लेकर उनकी ओर से अंतर्राष्ट्रीय सोच के कई नए मानक झरने की तरह इतिहास को बहते दिखाई देते.
खांटी सांस्कृतिक देशज समाजवादी
जयप्रकाश, अशोक मेहता, अच्युत पटवर्धन, नरेन्द्र देव, यूसुफ मेहर अली वगैरह के साथ लोहिया ने समाजवादी आंदोलन की स्थापना की. यूसुुफ मेहर अली उन्हें मजाक में ‘बंजारा समाजवादी‘ कहते थे. वे लोग समाजवाद को फकत शासन प्रणाली या जीवन व्यवस्था की समझाइशों के मानिन्द नहीं कहते थे. उनकी राय में समाजवाद अनुशासित, व्यवस्थित और क्रियाशील जीवनदर्शन है. समाजवाद की लोहिया की मान्यता उससे भी ज़्यादा मनुष्यमुखी, प्रगतिशील, जद्दोजहदभरी, आदर्शोन्मुख लेकिन गैरसमझौताशील होती रही. गांधी विचारों के साथ उन्होंने आइन्स्टाइन के वैज्ञानिक चिन्तन और जर्मन नवस्वच्छन्दतावाद को मिलाकर अमलगम भी बनाया था.
उनके चिंतन की बेचैनी में पूरे संसार की प्रतिनिधि दार्शनिक चेतना को आंतरिक करने की कोशिश थी. बूर्जुआ बुद्धिवादियों को लोहिया का ‘यूटोपिया‘ अव्यावहारिक तथा स्वयम्भू प्रगतिशील वामपंथी विचारकों को अतिआदर्शवादी प्रतीत होता रहा है. अधकचरे, फैशनेबिल, किताबी समाजवादियों की भीड़ से हटकर लोहिया आजीवन समाजवादी सम्भावनाओं की ताकतों के अंतरिक्ष में मनुष्य हितों के एकीकरण के लिए काम करते रहे. आदर्श जनअभिमुखी शासन की स्थापना के लिये ‘चौखम्भा राज्य‘ की उनकी मौलिक परिकल्पना थी.
लोहिया में अदभुत मौलिकता होने के साथ साथ एक चिंतक का एकाकीपन भी मुखर था. गांधी को भी लेकर लोहिया में अंधभक्ति नहीं थी. उन्होंने कई मुद्दों और मौकों पर गांधी के विचार को संशोधित करने तक की कोशिशें कीं. मानव जाति में एकता के पक्षधर लोहिया को विदेशी जननायकों ने भी आकर्षित किया था. लोहिया ने भी अपनी विदेश यात्राओं के दौरान अपने युवा चिंतन से उन्हें सराबोर किया. जवाहर लाल नेहरू ने बाद में भी उन्हें कई बार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपनी भी चाहीं लेकिन अपने असमझौतावादी रुख के कारण लोहिया ने ऐसे प्रस्तावों को खारिज कर दिया. देश की समृद्ध ऐतिहासिक परंपराओं के प्रति लोहिया की वैज्ञानिक समझ अपने समय के लिए एक नया नजरिया तैयार करती थी. उनकी मौजूदगी भारतीय राजनीति और जनजीवन को स्पंदित करती रहती थी.
लोहिया ने जयप्रकाश नारायण को पत्र लिखकर अपनी परेशानी भी बताई थी. जयप्रकाश नारायण भारतीय समाजवादी आंदोलन में मैदानी राजनीति का मोर्चा संभाल लें. लोहिया के लिए बौद्धिक विचार और चिंतन का क्षेत्र छोड़ दें. तो दोनों मिलकर देश की राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं. लोहिया के निधन के आठ-दस वर्ष बाद जयप्रकाश नारायण ने खुद को जनयुद्ध में झोंक दिया तो वे भारतीय राजनीति के कुतुबनुमा बन तो गये थे. तब तक बहुत देर हो चुकी थी. लोहिया चले गये थे. जयप्रकाश काफी अशक्त हो चले थे.
कभी कभी लगता है कि गांधी को भले ही नहीं लेकिन लोहिया को संविधान सभा की बैठकों में होना चाहिए था. संविधान अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद एक संस्कृति-संपन्न नजरिया वाचाल नहीं कर पाया है. उसमें इन्सानी जीवन को लेकर वह ऊष्मा, तरलता, चिंता और ज़िद शामिल नहीं है जो आम आदमी के जीवन को साभ्यतिक बनाने के लिए राज्यसत्ता के उत्तरदायित्वों को तय करे. इस बांझ वाक्य में कोई अर्थ नहीं है कि राज्य की कोई संस्कृति नीति नहीं होगी या कि राज्य सांस्कृतिक सरोकारों से खुद को सक्रिय रूप से संबद्ध नहीं करेगा. यह यूरोपीय अवधारणा संविधान के पाठ में अंतरध्वनि की तरह है क्योंकि मूलतः इंग्लैंड और अमेरिका में शासन और संविधान के अंतर्भूत संस्कारों में धर्म बहुलता और धार्मिक आडंबरों सहित संस्कृतियों के समुच्चय से बनी एक राष्ट्रीय संस्कृति का लंबा इतिहास नहीं है.
संस्कृति संबंधी अधिकारों का विवेचन करते हुए संविधान बमुश्किल अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों तक सीमित हो गया है. किसी तरह अनुच्छेद 39 में संस्कृति के बाहरी आवरणों के प्रति अपनी रुचिकर परंतु सीमित प्रतिबद्धता का ऐलान करता है. ठीक उसी तरह जैसे लायंस या रोटरी क्लब के महानुभाव किसी प्याऊ या नेत्रदान शिविर का उद्घाटन, समर्पण करते हैं. लोहिया होते तो उन्होंने संविधान बनाते वक्त मानवधर्मी, मानव अधिकार युक्त और मानव की गरिमा से सींचने की कोशिश संविधान सभा में जरूर की होती. मानव अधिकार तक संविधान में ठीक से वर्णित नहीं हैं.
यूरोप और अमेरिका के अवाम लोग भारत के शासनतंत्र, जातिप्रथा, मतवाद, बहुलधर्मिता, वर्णाश्रम जैसी कई रूढ़ियों से परिचित प्रताड़ित नहीं हैं. इसलिए मूल अधिकारों का भारतीय संविधान में जो निरूपण हुआ है, वह मानव अधिकारों के लचीले संदर्भों को भुलाता सा नज़र आता है. संविधान में मूल अधिकारों की दुर्गति के अध्ययन से भी पता चलता है कि लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे उनके साथियों ने मनोनीत हो जाने पर भी यदि संविधान सभा में अपनी हाजिरी दर्ज नहीं कराई तो उससे भी संविधान को एक बोझिल किताब के रूप में पढ़ा जा रहा है.
हिन्दी के समर्थक भले ही संविधान सभा में उसे राष्ट्रभाषा कहते हुए राजभाषा बनाने की वकालत करते रहे हों, उन्होंने कभी भी यह पलटवार नहीं किया कि विक्टोरिया के युग के शास्त्रीय मुहावरों से लकदक अंगरेजी भाषा भारत का संवैधानिक संस्कार रच रही थी. वह पंडिताऊ किस्म की प्रांजल बनने की कोशिश करती भाषा थी जिससे एक उबाऊपन पैदा होता है. उसमें ऊंचे आदर्शों के व्याख्यान देने की क्षमता तो है लेकिन भारत के करोड़ों लोगों की चिंताएं और उनके निदान भाषा या दुरूहता के कारण भी ठीक से दर्ज नहीं हो पाए. बाद में लोहिया ने ब्रिटिश काल के सांस्कृतिक अवशेषों से जूझते हुए शब्दकोश के लिए कई नए शब्द गढ़े जो केवल चर्चा का विषय नहीं रहे. उन्होंने अभिव्यक्ति के इतिहास में अपनी जगह सुरक्षित कर ली है.
लोहिया, नरेन्द्रदेव और जयप्रकाश नारायण सहित कुछ नामचीन समाजवादियों को संविधान सभा की बैठकों में नामांकित या प्रस्तावित होने पर शामिल होना चाहिए था जिन्हें बाद में चाहने पर भी नहीं लिया गया. संविधान सभा अपनी कुल बहसों के हासिल बतौर चाहने पर भी जनसांस्कृतिक संविधान का चेहरा उकेर नहीं पाई. खारिज हो चुकी कई यूरोपीय अवधारणाएं संविधान के पाठ में अंतरध्वनि की तरह पैठकर उसे भरमाती रहती हैं. इंग्लैंड और अमेरिका जैसे कई देशों में मसलन शासन और जनसंस्कृति की अंतर्भूत पारस्परिकता को लेकर धर्मबहुलता का भारत जैसा राष्ट्रीय अनुभव नहीं है. जनसंस्कृति संबंधी व्यापकताओं का विवेचन करते करते संविधान बमुश्किल अल्पसंख्यकों के अधिकारों तक ही रुक गया.
राज्य के नीति निदेशक तत्वों की सूची के भविष्य आचरण के तहत भी राष्ट्रीय सांस्कृतिक अहसास का संकेत उभारा नहीं जा सका. यह अकेले और सबसे ज्यादा लोहिया हैं जिन्होंने संविधान के मूल कर्तव्यों, बिटिया के दहेज जैसे नीति निदेशक तत्वों और भारत के ‘हम लोग‘ वाले मुखड़े के तेवरों में सांस फूंकी. वह अकेले और सबसे ज्यादा लोहिया ने किया.
लोहिया और गांधी
लोहिया गांधी नहीं थे. वे किसी की अनुकृति हो भी नहीं सकते थे. उन्होंने लिखा भी था-‘मैं मानता हूं कि गांधीवादी, या मार्क्सवादी होना हास्यास्पद है और उतना ही हास्यास्पद है गांधी-विरोधी, या मार्क्स-विरोधी होना. गांधी और मार्क्स के पास सीखने के लिये बहुमूल्य धरोहर है, किन्तु सीखा तभी जा सकता है जब सीख का ढांचा किसी एक युग, एक व्यक्ति से नहीं पनपा हो?‘ (गणेश मंत्री).
”लोहिया के अनुयायी और जीवनीकार ओमप्रकाश दीपक के अनुसार लोहिया जर्मनी में ही थे तो गांधी जी का प्रसिद्ध दांडी मार्च हुआ, फिर धरसाना का ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह जिसमें बेहोश हो जाने तक बिना पीछे कदम हटाये मार खाने वालों में लोहिया के पिता हीरालाल जी भी थे सारे देश में असंतोष की लहरें उठ रही थीं, उन्हीं दिनो जेनेवा में राष्ट्र संघ (लीग आफ नेशन्स) की बैठक हुई तो लोहिया भी वहां पहुंचे, और जब भारतीय प्रतिनिधि के रूप में बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह बोलने को खड़े हुए तो लोहिया ने दर्शक दीर्घा से जोर की सीटी बजायी और व्यंग्य भरी आवाजें कसीं कुछ देर भवन में हलचल हुई, फिर पहरेदारों ने लोहिया को वहां से हटा दिया, लेकिन उस घटना के बहाने हिंदुस्तान की आज़ादी का सवाल एक बार फिर यूरोप के अखबारों में उठा.”
अंगरेजी में लिखे अपने एक महत्वपूर्ण लेख में लोहिया के निकटतम सहयोगी रहे मधु लिमये ने संक्षेप में लोहिया और गांधी के वैचारिक रिश्ते के शुरूआती लक्षणों को लेकर लिखा हैः Dr. Rammanohar Lohia’s contribution to the socialism movement was outstanding. He was the first socialist thinker in India who refused to have his mental horizon limited or dominated by the ideas drawn from the West or the Soviet Union. He took into account the special condition prevailing in the two-thirds of the retarded regions of the world, and especially, India and sought to work out his ideas in consonance with these conditions. Although profounding influenced by Gandhiji’s ideals, he was no slavish follower of Mahatma Gandhi. He was a great votary of the principle of decentralization in all the aspects, but he was sensible enough to say that the solution of India’s problems cannot be acheieved at the technological level of Charkha. He was in favour of an innovative technology involving application of power and small machines which would avoid the pitfalls of centralized prohibition such as concentrarion of wealth, pollution, unemployment, income disparities and so on, and, at the same time, lower costs and raise the productivity and income of ordinary workers, whether working in the fields or in small, family workshops.
अपने सैद्धांतिक एका और कभी कभी मतभेद या अलग अलग समझ की लाक्षणिकताओं और संदर्भों के बावजूद लोहिया महात्मा गांधी के बहुत अधिक विश्वासपात्रों में थे. उनका रिश्ता बेहद आत्मीय था. उस स्फुरण में लोहिया ने खुद लिखा है ”गांधी जी के सामने कितनी आज़ादी से बात कही जा सकती थी. कोई संकोच नहीं, किसी व्यक्ति का डर नहीं, पूरी आज़ादी. मैं ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जानता जिसका इस विषय में भिन्न अनुभव हो. किसी और से बातें करने में मैं सतर्कतापूर्वक शिष्ट बना रहता था, परंतु गांधी जी से बातें करते समय मैं लापरवाह हो जाता था, क्योंकि वे मेरे भीतर जो कुछ रहता था उसे उगलवा लेते थे, यहां तक कि तीखी और स्पष्ट भाषा थी. यही मेरी उपलब्धि थी, चाहे अच्छी या बुरी. मेरा ऐसा व्यवहार हर दशा में भयरहित होता, क्योंकि वे भारत के संतरी थे और हमारी हरकत पर नज़र रखते थे. काश कि हर राष्ट्र में एक ऐसा ही संतरी होता, निश्चय ही उस योग्यता का नहीं, क्योंकि ऐसा पुरुष तो कई शताब्दियों में एक होता है, लेकिन एक ऐसा संतरी जिसे सभी आदर दें ताकि वह अपने लोगों के कामों में अंकुश बन सके.”
गांधी से अपनी मुलाकातों का जिक्र करते लोहिया ने एक मर्मस्पर्शी अंतिम संस्मरण दर्ज किया है, जो घटना नहीं घटनी थी. इतिहास में कई बार हुआ है, जब इस तरह कुछ घटनाएं घटी हैं या उनके विलोप हुए हैं. बहुत कोशिश करने पर भी गांधी बेलूर मठ पहुंचकर भी विवेकानन्द से नहीं मिल पाए. अन्यथा उनकी मुलाकात के बाद भारतीय राजनीति में कुछ अभिनव अर्थ गांधी की ओर से विस्तारित किया जा सकता. गांधी को लेकर लोहिया की यह मर्मांतक टिप्पणी भारतीय ताजा इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटनाओं में एक है.
”26 जनवरी को गांधी जी ने कहा कि तुमसे आवश्यक बातें करनी हैं. कल-परसों करूंगा. 28 जनवरी को फिर कहा कि समय नहीं बचता और तुमसे बातें विस्तार से करनी हैं. फिर 29 को कहा कि कल तुमसे ज़रूर ही बातें करूंगा. आखिर मुझे तुम्हारी पार्टी और कांग्रेस के बारे में कुछ निश्चय तो करना चाहिए. कल शाम ज़रूर आना पेट भरकर बातें होंगी. गांधी जी समझते थे कि हमारी पार्टी और कांग्रेस की पटरी मौजूदा रवैये में नहीं बैठ सकती. अतः इस संबंध में निर्णय लेने का गांधी का विचार बड़ा ही सामयिक और अनुकूल था. 30 की शाम को मैं एक टैक्सी लेकर गांधी जी से मिलने ‘बिड़ला भवन‘ की ओर चला. लेकिन रास्ते में ही गांधी जी की घृणित व नृशंस हत्या की ख़बर मिली. बिड़ला भवन पहुंचा तो वहां बहुत बड़ी भीड़ थी. केवल गांधी जी न थे. कमरे में उनका मृत शरीर पड़ा था. उस दिन लगा कि असली अर्थ में पहली बार अनाथ हुआ. देश का संतरी सामने मरा पड़ा था और देश के राजा बने लोग आंसू बहा रहे थे. गांधी जी के विश्वस्त चेलों-नेहरू व पटेल के गद्दी पर रहते भी गांधी जी की हत्या की गई.
मुझे गांधी जी की ‘ईश्वर का विश्वास‘ वाली कहावत याद आ गई. मैं सोच रहा था कि ईश्वर में अटूट श्रद्धा रखने वाला, जिसने ज़िंदगी-भर अहिंसा का प्रचार किया, आज उसका हिंसा द्वारा हनन हुआ. यह कितनी विपरीत घटना थी. गांधी जी के मृत शरीर को देखकर मैं बुदबुदा पड़ा था-‘क्यों आपने मेरे साथ और देशवासियों के साथ ऐसे दगाबाजी की? क्यों आप इतनी जल्दी चले गए?‘ पर मुझे इसका उत्तर भला कौन देता!”
लोहिया गांधी के अन्धभक्त नहीं थे. उन्होंने कई मुद्दों और मौकों पर गांधी विचार को अपने तईं परिभाषित, व्याख्यायित, सांदर्भिक करते विद्रोही तेवर में अमल में लाने प्रयत्न किये. मनुष्य जाति की अखंडता के पक्षधर लोहिया विदेशी जननायकों से भी आकर्षित होते रहे. लोहिया ने भी कई विश्वचिंतकों को आकर्षित किया. आज़ादी के बाद जवाहर लाल नेहरू ने कभी कभार जिम्मेदारियां सौपनी भी चाहीं, लेकिन अपने असमझौतावादी रुख के चलते लोहिया ने उन प्रस्तावों को खारिज किया.
ऐतिहासिक परंपराओं को लेकर लोहिया की वैज्ञानिक समझ समकालीन नया दृष्टिबोध तैयार करती रहती. सबसे ज्या़दा लोहिया राजनीति की उथलपुथल में जनजीवन को लगातार स्पंदित करते रहे थे. उन्होंने जयप्रकाश नारायण को पत्र में परेशानी भी बताई कि जे.पी. समाजवादी आंदोलन में मैदानी राजनीति का मोर्चा संभाल लें और लोहिया के लिए विचार और चिंतन का इलाका छोड़ दिया जाए. इससे दोनों मिलकर राजनीति में बेहतर सेवा और योगदान कर सकेंगे. आखिरकार लोहिया के निधन के सात आठ वर्षों बाद जयप्रकाश नारायण ने खुद को जनयुद्ध में झोंका ही. फिर भी राजनीति का कुतुबनुमा बन गये. तब तक लेकिन देर हो चुकी थी और जयप्रकाश कमज़ोर और बीमार हो चले थे.
सरकारी और मठी गांधीवादियों की अहिंसा को लोहिया ने कमजोर हिंसा और अहिंसा का मिश्रण कहा. इसका अर्थ था सेवाएं भी रखो लेकिन युद्ध में उनका ठीक से इस्तेमाल मत करो. (अपनी जनता के दमन के लिये भले ही इन्हें बहादुरी के पुरस्कार दो), इकतरफा निःशस्त्रीकरण की बात करो, मध्यस्थता, पंच-फैसला, द्विपक्षी बातचीत, प्रतिरक्षा की तैयारी के बहाने युद्ध की चुनौती को टालो आदि-आदि. ये सब प्रतिरोध से बचने के तरीके हैं. लोहिया ने इसे कमजोर हिंसा और अहिंसा का मिश्रण इसलिए कहा कि उनके अनुसार ‘‘अहिंसा के दो गुण हैं निहत्थापन और प्रतिरोध. इनमें से किसी एक को छोटा करना बड़ी भारी गलती होगी. अगर प्रतिरोध में कमी आई तो निहत्थापन कायरता और अन्याय के आगे सिर झुकाना होगा. यह आगे चलकर हथियारों और युद्ध को बढ़ावा देगा.‘‘ (लोहिया रचानावली खंड एकः पृष्ठ 147-149).
एक बार लोहिया ने गांधी के संस्मरण सुनाते हुए गांधी जी की एक महत्वपूर्ण बात बताई-‘‘1916 में गांधी जी ने कहा था कि मेरा देश कायरता और पौरुषहीनता के कारण मार्शल लाॅ के सामने झुकने के बजाए अगर कोई वाइसराय की हत्या करता है तो मैं उसे पसंद करूंगा.‘‘.....लोहिया ने अहिंसा को एक और आयाम भी दिया. यह है करुणा-मिश्रित क्रोध की अहिंसा. इसे भी बापू की देन ही कहा जा सकता है जिसके वशीभूत होकर कभी बापू ने कहा था कि जिस वाइसराय पर असंख्य लोगों को भूखा-नंगा रखकर अधिक खर्च किया जाता है उसका तो मर जाना ही अच्छा है. लोहिया ने इसे खूबसूरत उपमा दी .एक आंख में करुणा के आंसू एक में क्रोध की लाली.