रायगढ़: अडानी-अंबुजा की कोयला खदान के खिलाफ आदिवासियों का बिगुल
रायगढ़ । संवाददाता: छत्तीसगढ़ का रायगढ़ जिला एक बार फिर कोयला खनन के खिलाफ बड़े जन-आंदोलन का केंद्र बन गया है. धरमजयगढ़ ब्लॉक में स्थित 'पुरुंगा भूमिगत कोयला ब्लॉक' को लेकर स्थानीय आदिवासी समुदायों और प्रशासन के बीच तनाव चरम पर है.
अडानी समूह की सहायक कंपनी अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड को आवंटित इस खदान के खिलाफ ग्रामीणों ने लामबंद होते हुए अपनी जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा के लिए संघर्ष तेज कर दिया है.
मार्च 2023 में वाणिज्यिक नीलामी के दौरान आवंटित यह ब्लॉक मांड-रायगढ़ कोयला क्षेत्र के लगभग 8.7 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जिसमें 260 मिलियन टन कोयले का भंडार होने का अनुमान है. हालांकि, इस परियोजना का विरोध केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दस आदिवासी गांवों के अस्तित्व और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील कोकदार आरक्षित वन की सुरक्षा से जुड़ा है.
रायगढ़ जिला संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम यानी पेसा (PESA) कानून के तहत ग्राम सभाओं को व्यापक अधिकार प्राप्त हैं. विवाद की ताज़ा वजह जिला प्रशासन द्वारा 11 नवंबर 2025 को बुलाई गई जनसुनवाई है, जो पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया का एक हिस्सा है.
इस घोषणा के विरोध में पुरुंगा, सावरसिंघा और कोकोदर जैसे गांवों के ग्रामीणों ने पेसा कानून की शक्ति का उपयोग करते हुए विशेष ग्राम सभाएं बुलाईं और सर्वसम्मति से परियोजना के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया. ग्रामीणों का गुस्सा यहीं नहीं थमा.
उन्होंने जिला कलेक्टर कार्यालय का घेराव कर जनसुनवाई रद्द करने की मांग को लेकर एक ज्ञापन भी सौंपा. ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि उनकी सहमति के बिना उनकी जमीन पर किसी भी प्रकार का औद्योगिक हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
सामुदायिक विरोध के पीछे दो मुख्य और गहरे सरोकार हैं. पहला, ग्रामीणों को डर है कि भूमिगत खनन से स्थानीय जल स्तर बुरी तरह प्रभावित होगा, जिससे उनके खेती और दैनिक उपयोग के जल स्रोत सूख जाएंगे. इसके साथ ही, कोकदार जंगल में खनन गतिविधियों से पहले से ही गंभीर मानव-हाथी संघर्ष और अधिक गहरा होने की आशंका है.
स्थानीय आंकड़ों के अनुसार, साल 2001 से अब तक हाथी हमलों में 167 ग्रामीणों की जान जा चुकी है और 69 हाथियों की भी मृत्यु हुई है. ग्रामीणों का तर्क है कि जंगल का बना रहना उनके जीवन की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है.
दूसरा बड़ा आरोप यह है कि कंपनी के किसी भी प्रतिनिधि ने अब तक सीधे तौर पर उनसे संवाद नहीं किया है. हालांकि प्रशासन और एसडीएम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि भूमिगत तकनीक से विस्थापन कम होगा और वन मंजूरी के बिना काम शुरू नहीं होगा, लेकिन ग्रामीणों ने इसे अपर्याप्त बताते हुए खारिज कर दिया है.
कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो यह मामला पेसा अधिनियम 1996 और वन अधिकार अधिनियम 2006 (FRA) के उल्लंघन का प्रतीत होता है. पेसा की धारा 4(i) स्पष्ट करती है कि अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण से पूर्व ग्राम सभा से परामर्श अनिवार्य है.
वहीं, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'नियमगिरी' फैसले का हवाला देते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि ग्राम सभा के पास अपनी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को विनाशकारी प्रथाओं से बचाने की शक्ति और कर्तव्य दोनों हैं.
स्थानीय विधायक लालजीत सिंह राठिया और पर्यावरण कार्यकर्ता राजेश त्रिपाठी ने भी इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया है. त्रिपाठी का आरोप है कि औद्योगिक हितों को साधने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं को व्यवस्थित तरीके से दरकिनार किया जा रहा है. जैसे-जैसे जनसुनवाई की तारीख करीब आ रही है, रायगढ़ के जंगलों से उठी यह आवाज अब विकास बनाम विनाश की एक बड़ी बहस का रूप ले चुकी है.