विरोध स्थल पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकते- सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
विरोध प्रदर्शन के अधिकार के साथ दूसरों की रोजी-रोटी का अधिकार भी जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी एक समूह द्वारा स्थायी रूप से विरोध स्थल घेरने से अन्य संगठनों के अधिकार प्रभावित होते हैं.
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने दिल्ली में हुए प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि कोई भी प्रदर्शनकारी किसी विरोध स्थल पर अनिश्चित काल के लिए कब्जा जमाकर नहीं बैठ सकता. अदालत ने कहा कि ऐसे स्थानों पर केवल एक निश्चित अवधि के लिए ही रुकने की अनुमति दी जा सकती है ताकि अन्य समूहों को भी वहां अपनी बात रखने का अवसर मिल सके.
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सवाल उठाया कि अगर एक ही समूह जगह को घेरे रहेगा तो किसान, मजदूर, ट्रेड यूनियन और बेघर लोग अपनी आवाज उठाने कहां जाएंगे, क्योंकि विरोध करने का अधिकार सभी के पास है.
प्रदर्शन का अधिकार बनाम दिहाड़ी मजदूरों की रोजी-रोटी
अदालत ने आंदोलन के कारण दिहाड़ी मजदूरों और आम लोगों को होने वाले नुकसान पर चिंता व्यक्त की. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संविधान में विरोध करने के अधिकार की तरह ही व्यापार और व्यवसाय करने का अधिकार भी मान्यता प्राप्त है. व्यापार का मतलब सिर्फ बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध एक दिहाड़ी मजदूर के जीवन-यापन से है.
अदालत ने टिप्पणी की कि जब रास्ते और बाजार बंद होते हैं, तो वह गरीब व्यक्ति अपनी दैनिक रोटी के लिए कहां जाएगा. इसके साथ ही पीठ ने कहा कि अन्य प्रदर्शनकारियों के अनुरोधों को अनदेखा कर किसी एक पक्ष को स्थायी एकाधिकार देने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
व्यापारियों का ₹2,000 करोड़ के नुकसान का दावा
सुनवाई में व्यापारियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने आरोप लगाया कि रामलीला मैदान के आसपास के थोक बाजारों, असफ अली रोड, दरियागंज, तुर्कमान गेट और कमला मार्केट जैसे इलाकों में रहने वाले लाखों लोग प्रदर्शनों से प्रभावित हो रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि त्योहारों के सीजन में बिक्री न होने से ₹2,000 करोड़ का राजस्व नुकसान हुआ है.
इस पर न्यायमूर्ति बागची ने सवाल किया कि क्या व्यापार में कमी का कारण केवल प्रदर्शनकारी हैं, या फिर सरकार द्वारा लगाए गए बैरिकेड्स और दुकानें बंद कराने जैसे कदम भी इसके लिए जिम्मेदार हैं.
जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि दुकानें जबरन बंद कराई जाती हैं और प्रदर्शन हिंसक रूप ले लेते हैं. उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के 17 दिनों के अनधिकृत ठहराव और बिना अनुमति संसद भवन की ओर मार्च करने का जिक्र करते हुए कहा कि बिना अनुमति लोकतंत्र के प्रतीकों की तरफ कूच करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
सार्वजनिक स्थान पर विरोध और निजता के अधिकार की सीमा
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने प्रदर्शनों के दौरान सरकार द्वारा की जा रही निगरानी और उसके कानूनी ढांचे पर सवाल उठाया. उन्होंने तर्क दिया कि सार्वजनिक स्थान पर प्रदर्शन करते समय भी नागरिकों को निजता का अधिकार प्राप्त है.
इसके जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वहां केवल सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे, जबकि सैकड़ों इन्फ्लुएंसर्स खुद लाइव रिकॉर्डिंग कर रहे थे.
इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर खड़ा होता है, तो वहां निजता की वाजिब उम्मीद की एक सीमा होती है. व्यक्ति सार्वजनिक रूप से आकर यह दावा नहीं कर सकता कि उसकी निजता पूरी तरह से सुरक्षित रहे.