छत्तीसगढ़ में शराब पर छिड़ा सियासी संग्राम
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों बुनियादी मुद्दों को छोड़कर शराब नीति को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है. हालिया राजनीतिक विवाद की शुरुआत वन मंत्री केदार कश्यप के एक तीखे बयान से हुई, जिसमें उन्होंने कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार पर शराब घोटाले के आरोप लगाए. इसके बाद दोनों दलों में पलटवार का दौर शुरू हो गया, जिसने राज्य की पूरी राजनीति को शराब और उससे मिलने वाले राजस्व के इर्द-गिर्द लाकर खड़ा कर दिया है.
जहां भाजपा कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप मढ़ रही है, वहीं कांग्रेस का दावा है कि भाजपा ने राज्य को शराब और नशे का गढ़ बना दिया है.
इस विवाद में उस वक्त एक नया मोड़ आ गया जब राज्य के आबकारी मंत्री लखनलाल देवांगन ने एक सार्वजनिक बयान में स्वीकार किया कि शराब की बिक्री के बिना राज्य में विकास कार्य ठप हो सकते हैं. आबकारी मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य की महत्वाकांक्षी 'महतारी वंदन योजना' सहित कई प्रमुख विकास योजनाएं शराब और खनन से मिलने वाले राजस्व के भरोसे ही चल रही हैं.
उन्होंने तर्क दिया कि यदि शराब की बिक्री बंद कर दी गई, तो कई विकास परियोजनाएं रुक जाएंगी, क्योंकि यह क्षेत्र राज्य की कमाई का सबसे बड़ा जरिया है.
इस बयान पर पलटवार करते हुए छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने भाजपा सरकार को आड़े हाथों लिया. उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले ढाई वर्षों में भाजपा ने छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' से बदलकर नशे के केंद्र में तब्दील कर दिया है.
दीपक बैज ने सरकार को चुनौती दी कि यदि वे वास्तव में जनहित चाहते हैं, तो बिहार और गुजरात की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी पूर्ण शराबबंदी लागू करके दिखाएं. कांग्रेस ने यह भी तंज कसा कि जो सरकार राज्य की जनता को साफ पीने का पानी नहीं दे पा रही है, उसके मंत्री इस तरह के बयान दे रहे हैं.
इस बीच, बढ़ते राजनीतिक गतिरोध को देखते हुए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सभी नेताओं से बयानों में शालीनता और मर्यादा बनाए रखने की अपील की है. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छत्तीसगढ़ की राजनीति हमेशा से शराब राजस्व से जुड़ी रही है.
एक तरफ सरकार 19 से 26 जून तक अंतरराष्ट्रीय नशा निवारण दिवस के मौके पर 'नशामुक्त भारत अभियान' चला रही है, तो दूसरी तरफ राज्य में शराब की दुकानों और बार के लाइसेंसों की संख्या लगातार बढ़ाई जा रही है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में राज्य में 689 शराब दुकानें संचालित थीं, और चालू वित्तीय वर्ष में 29 नई दुकानें खोली गई हैं, साथ ही 205 बार और क्लबों को लाइसेंस दिए गए हैं.
जानकारों का कहना है कि सरकार को अपनी कल्याणकारी योजनाओं के लिए आबकारी राजस्व पर निर्भरता कम करनी चाहिए. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ सरकार शराब आबकारी से सालाना करीब 1,000 से 1,200 करोड़ रुपये कमाती है.
जानकारों का यह भी मानना है कि यदि सरकार वास्तव में राज्य को नशामुक्त बनाना चाहती है, तो उसे राजस्व बढ़ाने के बजाय शराब की बिक्री को धीरे-धीरे कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि विकास और सामाजिक सुधारों के बीच एक सही संतुलन बनाया जा सके.