शनि, 17 अक्टू. 2026

CGKhabar

बस्तर में SIR पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका

C

CG Khabar

30 नव. 2025, 02:58 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

बस्तर में SIR
बस्तर में SIR

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन SIR की प्रक्रिया जारी है, लेकिन इसी बीच कोंटा से पूर्व विधायक और बस्तरिया राज मोर्चा के संयोजक मनीष कुंजाम ने इस प्रक्रिया को लेकर गंभीर आशंकाएँ जताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है.


उन्होंने आरोप लगाया है कि मौजूदा प्रारूप में चल रही SIR से बस्तर के हजारों आदिवासी मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का खतरा है. इसी आशंका के चलते उन्होंने चुनाव आयोग की प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

विज्ञापन


कुंजाम ने बताया कि SIR का मौजूदा ढांचा बस्तर की भौगोलिक व सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप बिल्कुल नहीं है. कई दूर-दराज़ और जंगलों में बसे गांव ऐसे हैं जहाँ तक अभी भी बेसिक प्रशासनिक पहुंच संभव नहीं हो पाती. ऐसे में यह अपेक्षा करना कि सभी लोग तय समय सीमा में दस्तावेज़ जमा कर सकेंगे, वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज़ करता है.


कुंजाम की याचिका पर 1 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉय माल्या बागची की बेंच सुनवाई करेगी. याचिका में उन्होंने कहा है कि एसआईआर की मौजूदा प्रक्रिया उन आदिवासी परिवारों के लिए असंभव बोझ बन गई है, जिनके पास न तो नियमित दस्तावेज़ हैं और न ही वे प्रशासनिक कार्यालयों तक आसानी से पहुँच सकते हैं. सुनवाई के बाद अदालत द्वारा लिया गया निर्णय इस क्षेत्र के लाखों मतदाताओं के अधिकारों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करेगा.


मनीष कुंजाम ने बताया कि सलवा जुडूम अभियान के दौरान बस्तर के 644 गांव वीरान हो गए थे. हजारों घर जला दिए गए थे, लोग अपने मूल गांवों को छोड़कर जंगलों या पड़ोसी राज्यों में शरण लेने को मजबूर हो गए थे. ऐसे अधिकांश परिवारों के पास आज भी वैध दस्तावेज़ नहीं हैं. 


उन्होंने कहा- “कोई BLO इन जंगलों के बीच बसे गांवों तक कैसे पहुँच सकता है? दस्तावेज़ मांगने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि लोगों के पास दस्तावेज़ हैं ही नहीं.”


पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने स्पष्ट कहा कि मतदान करना हर नागरिक का मौलिक संवैधानिक अधिकार है और इसकी रक्षा की ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग की है. लेकिन उनकी नज़र में SIR का मौजूदा प्रारूप इस अधिकार को कमजोर कर सकता है, खासकर उन समुदायों के लिए जो पारंपरिक जीवनशैली जीते हैं और शहरी दस्तावेज़ीकरण प्रणाली का हिस्सा नहीं हैं.


उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों से जुड़ा मुद्दा है- “बस्तर की अनोखी जनजातियाँ कागज़ी प्रक्रियाओं में फिट नहीं बैठतीं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके मताधिकार को खतरे में डाला जाए”


SIR को लेकर उठी यह चिंता बस्तर के कई इलाकों में चर्चा का विषय बन चुकी है. आदिवासी समुदायों का कहना है कि यदि प्रक्रिया को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप लचीला नहीं बनाया गया, तो हजारों लोग वोटिंग लिस्ट से बाहर हो सकते हैं, जिसका असर भविष्य के चुनावों पर भी पड़ सकता है.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP