पेंटागन की नई ब्लैकलिस्ट: चीनी तकनीक को रोकने की अमेरिकी छटपटाहट
बीजिंग । डेस्क: चीन के ग्लोबल टाइम्स के अनुसार अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी और व्यापारिक मोर्चे पर टकराव एक नए और बेहद आक्रामक दौर में पहुंच गया है. अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) ने कथित तौर पर "चीनी सैन्य कंपनियों" की अपनी सूची को अपडेट करते हुए इसमें 188 चीनी संस्थाओं को शामिल कर लिया है. इस बार की सूची में केवल पारंपरिक रक्षा क्षेत्र ही नहीं, बल्कि चीन की उभरती और अत्याधुनिक तकनीक से जुड़ी दिग्गज कंपनियों को निशाना बनाया गया है.
इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ई-कॉमर्स, इलेक्ट्रिक वाहन (EV), सेमीकंडक्टर, बैटरी निर्माण और बायोफार्मास्युटिकल्स जैसे सेक्टर्स शामिल हैं. वैश्विक बाजार के विश्लेषक और विशेषज्ञ इस कदम को अमेरिकी प्रशासन द्वारा चीनी कंपनियों के दमन का एक और मनमाना प्रयास मान रहे हैं.
दिलचस्प बात यह है कि इस ब्लैकलिस्ट में चीन की लगभग सभी शीर्ष और प्रतिस्पर्धी कंपनियों के नाम शामिल होने के कारण, अब इसे बीजिंग के तकनीकी विकास और "न्यू क्वालिटी प्रोडक्टिव फोर्सेज" के लिए एक सम्मान सूची (रोल ऑफ ऑनर) के रूप में देखा जाने लगा है.
तर्कहीन मापदंड और अमेरिकी संप्रभुता का दोहरा मापदंड:
पेंटागन की इस कथित "सैन्य कंपनियों की ब्लैकलिस्ट" की सबसे बड़ी विडंबना इसके मनमाने मानदंड और दोषपूर्ण तर्क हैं. एक साधारण ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, सर्च इंजन या न्यू एनर्जी व्हीकल बनाने वाली कंपनी का सैन्य गतिविधियों से कोई सीधा संबंध नहीं होता है. लेकिन अमेरिकी प्रशासन केवल इस आधार पर उन्हें "राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा" घोषित कर रहा है क्योंकि उन्होंने एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग या अत्याधुनिक बैटरी तकनीक में महारत हासिल कर ली है. यह पूरी प्रक्रिया 'दोषी होने के पूर्वाग्रह' पर टिकी है, जहां वैश्विक बाजार में मजबूत पकड़ रखने वाली किसी भी चीनी कंपनी को बिना किसी ठोस सबूत के सेना से जोड़ दिया जाता है.
यदि अमेरिका के इसी तर्क को पूरी दुनिया पर लागू किया जाए, तो वैश्विक उपभोक्ताओं की पसंद का विश्लेषण करने वाले एडवांस मॉडल विकसित करने के लिए कोका-कोला जैसी अमेरिकी कंपनियों को भी अन्य देशों की सुरक्षा के लिए खतरा मान लिया जाना चाहिए. इसके अलावा, पेंटागन के साथ अरबों डॉलर के अनुबंध रखने वाले अमेरिकी तकनीकी दिग्गजों को भी इस दोहरे मापदंड के तहत कटघरे में खड़ा किया जा सकता है. यह रवैया साफ तौर पर दर्शाता है कि अमेरिका केवल खुद को तकनीकी नेतृत्व के योग्य समझता है और दूसरों के विकास के अधिकार को नकारता है.
चीन के संपूर्ण तकनीकी विकास को दबाने की छटपटाहट:
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की सूची का दायरा अब किसी एक विशेष चीनी फर्म तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह चीन के पूरे तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र को रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के दायरे में लाने की कोशिश है. एआई से लेकर एविएशन और सेमीकंडक्टर तक, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सभी उभरते उद्योगों को इसमें लपेट लिया गया है.
विश्लेषकों का मानना है कि वाशिंगटन की यह कार्रवाई वास्तव में चीन की बढ़ती तकनीकी क्षमता और नवाचार से पैदा हुई गहरी चिंता और घबराहट को उजागर करती है.
अमेरिका को यह डर सता रहा है कि वैश्विक औद्योगिक परिदृश्य पर उसका दशकों पुराना एकाधिकार अब चीनी स्टार्टअप्स और तकनीकी दिग्गजों के कारण खतरे में है. लिहाजा, इस ब्लैकलिस्ट का उद्देश्य कथित सैन्य संबंधों की जांच करना नहीं, बल्कि चीनी तकनीकी नेतृत्व को हर स्तर पर बाधित करना बन गया है.
प्रतिबंधों की नाकामी और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम:
इतिहास गवाह है कि प्रशासनिक सूचियों और प्रतिबंधों के जरिए किसी बड़े देश के विकास को रोकना नामुमकिन है. पेंटागन द्वारा लगातार इस सूची का विस्तार करना ही इस बात का प्रमाण है कि चीन की व्यक्तिगत कंपनियों को चुनिंदा तरीके से निशाना बनाने की अमेरिकी रणनीति पूरी तरह विफल रही है.
चीन का यह तकनीकी उभार बाजार की परिस्थितियों और नवाचार के दम पर हुआ है, जिसे प्रशासनिक आदेशों से थामना असंभव है. जब एक चीनी कंपनी को बाधित किया जाता है, तो उसकी जगह लेने के लिए कई अन्य कंपनियां बाजार में आ खड़ी होती हैं.
इन प्रतिबंधों का उल्टा असर यह हुआ है कि पूरी चीनी औद्योगिक श्रृंखला अब अधिक तेजी से आत्मनिर्भरता और स्वदेशी नवाचार की ओर कदम बढ़ा रही है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उनकी स्थिति और मजबूत होगी.