रवि, 18 अक्टू. 2026

CGKhabar

बस्तर में पत्थलगड़ी, जागरुकता या विवाद

छत्तीसगढ़ के बस्तर में पत्थलगड़ी, सरकार के कान खड़े

C

CG Khabar

16 अप्रै. 2025, 10:07 AM 6 मिनट में पढ़ें 2

पत्थलगड़ी
पत्थलगड़ी

बस्तर | संवाददाताः छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के तोकापाल दरभा और बास्तानार ब्लॉक में सैकड़ों एसटी, एससी, और ओबीसी समुदाय के लोगों ने संविधान में मिले अधिकारों का हवाला देते हुए ऐलान किया है कि अब गांवों का शासन-प्रशासन और नियंत्रण ग्राम सभा के हाथों में होगा.


इस घोषणा के साथ ही लोगों ने बास्तानार ब्लॉक के किलेपाल और तरांगुर चौक में पत्थलगड़ी के बोर्ड भी स्थापित किए हैं. 

विज्ञापन


यह फैसला आंबेडकर जयंती के दिन लिया गया, जब क्षेत्र के लोग बुरंग्पाल में बने 'संवैधानिक गुड़ी' यानी 'संविधान मंदिर' में इकट्ठा हुए.


वहां डॅा. भीमराव आंबेडकर और पेसा कानून के निर्माता माने जाने वाले पूर्व कलेक्टर बीडी शर्मा को श्रद्धांजलि दी गयी.


रैली में मौजूद सर्व आदिवासी समाज के प्रदेश उपाध्यक्ष मोसू पोयाम, महारा समाज के सुन्दर सोढ़ी, महिला प्रभाग अध्यक्ष रुकमणि कर्मा, जनपद उपाध्यक्ष विनोद कोहड़ाम सहित बड़ी संख्या में लोग शामिल थे.


रुक्मणि कर्मा ने कहा कि संविधान ने आदिवासी समाज को कई अधिकार दिए हैं और पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में ग्राम सभा सर्वोच्च होती है. इसी आधार पर अब ग्राम सभा ही शासन और प्रशासन का काम देखेगी. 


क्या है पत्थलगड़ी ?

देश के कई आदिवासी इलाकों में ‘पत्थलगड़ी’ की एक पारंपरिक परंपरा रही है, जिसमें गांव की सीमा या कब्रगाह पर बड़े-बड़े पत्थर गाड़कर गांव के नियम-कानून या संदेशों को लिखा जाता हैयह तरीका समुदाय की एकजुटता और अधिकारों को जताने का एक तरीका रहा हैमावा नाटे मावा राज

जब संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आदिवासी इलाकों को विशेष अधिकार मिलने लगे और पंचायतों को मजबूत किया गया, तब बस्तर जैसे क्षेत्रों में ‘मावा नाटे मावा राज’ यानी ‘हमारा गांव, हमारा शासन’ जैसे अभियान भी शुरू हुए.


इसके बाद कई जगहों पर गांव की ग्राम सभा के अधिकार भी पत्थरों पर लिखकर गाड़े जाने लगे, जिससे उनका संदेश और भी मजबूत हो सके. यह परंपरा पाषाण काल से चली आ रही है और इसमें मृतकों की स्मृति, खगोल ज्ञान, बसाहट की जानकारी और सामाजिक नियमों को सार्वजनिक किया जाता है. 


विशेष रूप से झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में लोगों ने इन पत्थरों पर भारत के संविधान, पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून से जुड़े प्रावधानों को अंकित करना शुरू किया.


इसका मुख्य उद्देश्य था गांव के लोगों को उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के बारे में जानकारी देना, ताकि वे अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा कर सकें.


पेसा कानून 1996 के तहत ग्रामसभा को सर्वोच्च अधिकार प्राप्त हैं. ग्राम सभा गांव के सभी वयस्क मतदाताओं से मिलकर बनती है और इसे स्थानीय सरकार जैसा दर्जा दिया गया है.


इस कानून के अनुसार ग्रामसभा की अनुमति के बिना कोई भी सरकारी अधिकारी, बाहरी व्यक्ति या खनन कंपनी गांव में प्रवेश या कार्य नहीं कर सकती.


जब लोगों ने इन प्रावधानों को पत्थरों पर लिखकर गांव की सीमाओं पर स्थापित किया, तो यह केवल प्रतीकात्मक नहीं रहा, बल्कि एक सशक्त और शांतिपूर्ण आंदोलन बन गया. 


पत्थलगड़ी आंदोलन के नेताओं का मानना है कि आदिवासी क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आते हैं, इसलिए यहां संसद या विधानसभा के कानून सीधे लागू नहीं किए जा सकते.


वे संविधान के अनुच्छेद 13(3) का हवाला देते हैं, जिसके अनुसार रूढ़ि और परंपरा को विधिक मान्यता दी जा सकती है.


पर इसकी सीमाएं संविधान द्वारा तय होती हैं. सुप्रीम कोर्ट भी ग्रामसभा को स्थानीय संस्कृति, संसाधनों और विश्वासों की सुरक्षा का अधिकार दे चुका है.


जिससे यह अधिकार बनता है कि वे बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगा सकें.


आंदोलनकारी तर्क देते हैं कि जब सरकारी कार्यालयों या अपार्टमेंट्स में बिना अनुमति प्रवेश वर्जित हो सकता है, तो ग्रामसभा में क्यों नहीं? 


कुछ आंदोलनकारी पुराने Government of India Act 1935 को फिर से लागू करने की भी मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार कहती है कि भारत का संविधान लागू होते ही वह कानून निष्प्रभावी हो गया.


किलेपाल में लगे बोर्ड में लिखा गया है कि यह क्षेत्र आदिवासी समुदाय की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के तहत आता है.


इसमें 2011 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले (जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य) का हवाला देते हुए कहा गया है कि ग्रामसभा को सामान्य परती जमीनों पर अधिकार है.


साथ ही बताया गया है कि यह क्षेत्र स्वशासन के ग्राम समुदाय के अधिकार क्षेत्र में आता है. इस तरह बस्तर में पहली बार पत्थलगड़ी जैसी पहल सामने आई है, जिसमें ग्राम सभा को सर्वोच्च सत्ता घोषित किया गया है.


पेसा कानून का उद्देश्य पंचायतों को सशक्त बनाना

इस मामले पर कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही दलों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है.

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पीसीसी प्रमुख दीपक बैज ने कहा बस्तर के आदिवासी वहां के संसाधनों को बचाने के लिए लड़ रहे हैं और ग्राम पंचायतों को शशक्त बनाना ही पेसा कानून का उद्देश्य है.


यह छठवीं अनुसूची का क्षेत्र है. कांग्रेस ने पेसा कानून लागू किया, लेकिन भाजपा सरकार ने इसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया.


अब बस्तर की जनता अपने अधिकारों, अपने खनिज संसाधनों और अपनी जमीन को बचाने के लिए लड़ रही है. संविधान की व्यवस्था सबसे ऊपर

जगदलपुर विधायक और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जनता को भाजपा सरकार पर भरोसा है, मुख्यमंत्री खुद बस्तर पहुंचे हैं.


इस मामले में जरूर चर्चा होगी और समस्या का समाधान भी निकाला जाएगा.


वहीं बस्तर पहुँचे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि संविधान की व्यवस्था सबसे ऊपर है.


14 अप्रैल को ही संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती मनाई गई है और ऐसे में सभी को संविधान के नियम से ही चलना पड़ेगा.



उन्होने कहा कि हमें इसकी जानकारी मिली है और इस पर बातचीत की जाएगी.


जशपुर में हो चुका प्रयोग

इससे पहले जशपुर जिले में कुछ साल पहले पत्थलगड़ी जैसी गतिविधियां सामने आई थीं, जिनमें आदिवासी समुदाय के कुछ वर्गों ने ग्रामसभा की सर्वोच्चता की बात करते हुए प्रशासनिक व्यवस्था से अलग होने की आवाज उठाई थी.


हालांकि यह आंदोलन व्यापक रूप से नहीं फैल सका और प्रशासन ने संवाद के ज़रिए स्थिति को संभाला.


लेकिन मुख्यमंत्री विश्नुदेव साय के बयान से स्पष्ट है कि इस बार इस मामले में सरकार की प्रतिक्रिया बेहद सख्त हो सकती है. 


सरकार से टकराव की संभावना

बस्तर में पत्थलगड़ी की यह पहल आदिवासी समाज की संविधानिक समझ और अपनी परंपराओं के प्रति जागरूकता का प्रतीक माना जा सकता है.


लेकिन अगर आदिवासी अपने रुख पर कायम रहते हैं और पत्थलगड़ी का यह आन्दोलन और विस्तार पाता है तो सरकार से टकराव की स्थितियां भी पैदा हो सकती हैं.


.


.


यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP