69 अंतरराष्ट्रीय मेडल जीतने वाले पैरा रेसलर श्रीमंत झा को सरकारी नौकरी का इंतजार
जर्मनी में 2 अंतरराष्ट्रीय मेडल जीतकर लौटे छत्तीसगढ़ के पैरा आर्म रेसलर श्रीमंत झा ने अपनी जीत देश के शहीद जवानों को समर्पित की. 69 मेडल जीतने के बाद भी वे अब तक सरकारी नौकरी और खेल सम्मान की राह देख रहे हैं.
भिलाई । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के प्रतिभावान पैरा आर्म रेसलर श्रीमंत झा ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का परचम लहराया है. जर्मनी में 16 से 19 अक्टूबर तक आयोजित हुई प्रतियोगिता के 85 किलोग्राम वर्ग में कड़ा मुकाबला करते हुए श्रीमंत ने एक रजत और एक कांस्य पदक अपने नाम किया.
मेजबान देश जर्मनी के मजबूत खिलाड़ी एरिक होप को शिकस्त देकर अपनी ताकत का लोहा मनवाने वाले श्रीमंत ने इस ताजा कामयाबी को देश के वीर शहीद जवानों को समर्पित किया है. इस नई जीत के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके कुल पदकों की संख्या बढ़कर 69 हो गई है.
देश का नाम रोशन करने वाले इस खिलाड़ी का खेल सफर और पारिवारिक पृष्ठभूमि काफी संघर्षपूर्ण रही है. बेटे के खेल अभ्यास, पढ़ाई और विदेशी दौरों का खर्च उठाने के लिए श्रीमंत की मां को अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रखना पड़ा था, वहीं उनके पिता ने मजदूरी करके परिवार का पालन-पोषण किया.
परिजनों को उम्मीद थी कि अंतरराष्ट्रीय पदकों की बदौलत सरकारी मदद या नौकरी मिलेगी, लेकिन लंबे समय तक श्रीमंत को एक निजी कंपनी में नौकरी करके ही अपने परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी करनी पड़ीं.
विश्व स्तर पर लगातार तिरंगा फहराने के बावजूद श्रीमंत झा पिछले कई वर्षों से राज्य में सरकारी नौकरी और 'शहीद राजीव पांडे खेल पुरस्कार' के लिए अधिकारियों और मुख्यमंत्री कार्यालय के चक्कर लगा रहे हैं.
खेल विभाग के अनुसार पैरा आर्म रेसलिंग संगठन को केंद्र सरकार से पूर्ण मान्यता न मिलने के कारण तकनीकी अड़चनें आ रही हैं.
इस स्थिति से हताश होकर उन्होंने बीते अगस्त में सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी थी कि यदि उन्हें उचित सम्मान और रोजगार नहीं मिला तो वे अपने सभी मेडल सरकार को सौंपकर उनकी नीलामी की मांग करेंगे, ताकि उससे मिलने वाली राशि से अपने माता-पिता का कर्ज उतारकर कोई छोटा व्यवसाय शुरू कर सकें.