गुरू, 22 अक्टू. 2026

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जगदलपुर: बस्तर दशहरा के दौरान बड़ा हादसा, रथ खींचने के दौरान 1 की मौत से मचा हंगामा

प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व की भीतर रैनी परंपरा के दौरान एक दर्दनाक हादसा हो गया, जहां विजय रथ के पहिए के नीचे आने से एक व्यक्ति की जान चली गई और अन्य गंभीर रूप से घायल हो गया.

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22 अक्टू. 2026, 08:25 AM 3 मिनट में पढ़ें 35

बस्तर दशहरा File Photo
बस्तर दशहरा File Photo

जगदलपुर । संवाददाता: विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व के दौरान बुधवार देर रात जगदलपुर में एक बेहद दुखद हादसा घटित हो गया. भीतर रैनी विधान की पारंपरिक रस्म निभाते समय आठ पहियों वाले विशालकाय विजय रथ का संतुलन अचानक बिगड़ गया. सिरहासर भवन के समीप भारी-भरकम रथ की चपेट में आने से दो ग्रामीण दुर्घटनाग्रस्त हो गए, जिनमें से एक की घटना स्थल पर ही मौत हो गई, जबकि दूसरे का पैर बुरी तरह कुचल गया. 

घायल ग्रामीण को तुरंत उपचार के लिए नजदीकी अस्पताल पहुंचाया गया है.

इस घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया और उपस्थित ग्रामीणों ने सुरक्षा तथा रोशनी के समुचित प्रबंध न होने का आरोप लगाते हुए जमकर विरोध-प्रदर्शन किया. आक्रोश बढ़ता देख प्रशासनिक अमला और भारी पुलिस बल मौके पर पहुंचे तथा स्थिति को किसी तरह शांत कराया. 

इस अप्रिय स्थिति के बाद जगदलपुर प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए रथ परिक्रमा के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं. अब सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के उद्देश्य से रथ के 15 मीटर आगे और पीछे के दायरे को पूरी तरह खाली रखा जाएगा, जहां केवल पुलिस बल और स्वयंसेवक ही सुरक्षा घेरा बनाकर तैनात रहेंगे.

गौरतलब है कि बस्तर दशहरा में भीतर रैनी परंपरा के तहत बुधवार को राजमहल परिसर से रथ चुराकर कुम्हड़ाकोट के जंगलों में ले जाने की पुरानी प्रथा निभाई जा रही थी. इस विशिष्ट रस्म में शामिल होने के लिए किलेपाल परगना के 32 गांवों से 2,000 से अधिक ग्रामीण इकट्ठा हुए थे. पूजा-अर्चना संपन्न होने के बाद जब ग्रामीण विशाल रथ को खींचकर जंगलों की ओर बढ़ा रहे थे, तभी यह दर्दनाक घटना घटित हो गई.

बस्तर दशहरा में भीतर रैनी विधान क्या है?

बस्तर दशहरा में भीतर रैनी विधान एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक रस्म है, जो सदियों से चली आ रही जनजातीय संस्कृति और जन-भागीदारी को दर्शाती है. इस विधान के तहत मुख्य रूप से आठ पहियों वाले विशाल 'विजय रथ' की काष्ठ चोरी (रथ चुराने) की अनोखी परंपरा निभाई जाती है. 

भीतर रैनी के दिन विशाल विजय रथ को बस्तर के विभिन्न परगनाओं, विशेषकर किलेपाल और माचकोट क्षेत्र से आए हजारों ग्रामीण उत्साहपूर्वक खींचकर जगदलपुर के सिरहासर भवन तक लाते हैं. इसके बाद पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं. 

रस्म का मुख्य आकर्षण देर रात तब शुरू होता है जब ग्रामीण पारंपरिक अधिकारों का पालन करते हुए इस विशाल रथ को 'चुराकर' राजमहल परिसर से दूर कुम्हड़ाकोट के जंगलों में ले जाते हैं. मान्यता है कि यह रस्म राजा और प्रजा के बीच के अटूट संबंध, ग्रामीणों के प्रति सम्मान और उनकी स्वायत्तता का प्रतीक है. 

अगली सुबह राजा या प्रशासनिक प्रतिनिधि कुम्हड़ाकोट पहुंचकर ग्रामीणों को मनाते हैं, उनके साथ 'नवाखाई' (नए अन्न का भोग) करते हैं और फिर रथ को ससम्मान वापस लाया जाता है, जिसे 'बाहर रैनी' की रस्म कहा जाता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP