क्या पाकिस्तान शांतिपूर्ण सैन्य तख्तापलट की ओर बढ़ रहा है?
नई दिल्ली । डेस्क: पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर द्वारा प्रस्तावित 27वें संवैधानिक संशोधन ने देश की राजनीतिक और सैन्य शक्ति संरचना में बड़े बदलावों की आशंका पैदा कर दी है. विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम एक 'शांत तख्तापलट' से कम नहीं है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं.
प्रस्तावित संशोधन मुनीर को अभूतपूर्व शक्ति प्रदान करता है. इसमें सेना प्रमुख के लिए आजीवन प्रतिरक्षा और कानूनी कार्रवाई से छूट का प्रावधान है. सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि यह संशोधन 'चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज' (CDF) का नया पद सृजित करता है, जिसे चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (यानी मुनीर स्वयं) द्वारा धारण किया जाएगा. यह CDF तीनों सेवाओं पर सर्वोच्चता रखेगा और उसे परमाणु हथियारों की कमान संभालने वाली नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड के प्रमुख की नियुक्ति की सलाह देने का अधिकार होगा. इस प्रकार, मुनीर पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार पर भी अप्रत्यक्ष रूप से पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लेंगे.
यह कदम पाकिस्तान के न्यायिक और नागरिक ढांचे को भी कमजोर करता है. यह संशोधन 1971 के युद्ध के बाद हमूदुर रहमान आयोग की सिफारिशों के विपरीत है, जिसने सेना और नागरिक सेटअप के बीच समन्वय सुनिश्चित करने के लिए 'ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी' (CJCSC) के पद की परिकल्पना की थी. मुनीर अब CJCSC के पद को समाप्त कर रहे हैं और सारी सैन्य शक्ति को अपने नए पद CDF में समाहित कर रहे हैं.
पूर्व में जनरल ज़िया-उल-हक को सत्ता हथियाने के लिए सैन्य बल का प्रयोग करना पड़ा था, लेकिन मुनीर यह सब प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ की कमजोर और सहयोगी सरकार के समर्थन से 'कानूनी' तरीके से कर रहे हैं. राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की चुप्पी सुनिश्चित करने के लिए, संशोधन में राष्ट्रपति की तरह 'फील्ड मार्शल' को भी आजीवन कानूनी प्रतिरक्षा का विशेषाधिकार दिया गया है.
न्यायिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए, संशोधन संघीय संवैधानिक न्यायालय बनाकर सुप्रीम कोर्ट को विभाजित करने की योजना भी बनाता है, जिससे देश में दो मुख्य न्यायाधीश हो जाएंगे और न्यायिक अनिश्चितता बढ़ेगी.
चूंकि इमरान खान जेल में हैं, मुनीर के इस कदम का विरोध केवल सड़कों पर या पश्चिमी क्षेत्रों में चल रहे विद्रोहों से ही आने की संभावना है. इस बीच, नई दिल्ली में इस घटनाक्रम पर गहन निगरानी की आवश्यकता महसूस की जा रही है, क्योंकि पाकिस्तान के पिछले सैन्य शासकों की तरह मुनीर भी चीन के साथ-साथ अमेरिका से भी पूर्ण समर्थन की उम्मीद कर रहे हैं.
यह 'शांत तख्तापलट' पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में सेना की भूमिका को संस्थागत और स्थायी बनाने का एक प्रयास है, जो देश को एक सैन्य-प्रधान सरकार की ओर धकेल सकता है.