पाकिस्तान: आसिम मुनीर बने और भी शक्तिशाली, नया रक्षा कानून पारित
इस्लामाबाद । डेस्क: पाकिस्तान की संसद ने देश के सैन्य ढांचे में अब तक का सबसे बड़ा और बड़ा बदलाव करते हुए एक नया कानून पारित कर दिया है. अगस्त के अंत में मंजूर किए गए ‘डिफेंस फोर्सेस ऑफ पाकिस्तान एक्ट, 2026’ और ‘नेशनल कमांड अथॉरिटी एक्ट, 2010’ में संशोधन के जरिए चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) के पद को कानूनी और वैधानिक दर्जा प्रदान कर दिया गया है. इस नए घटनाक्रम के साथ ही देश के थल सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को पाकिस्तान की तीनों सेनाओं-थल सेना, नौसेना और वायु सेना-का सर्वोच्च परिचालन कमांडर बना दिया गया है.
विश्लेषकों का मानना है कि वर्ष 1976 के बाद से यह पाकिस्तान के उच्च सैन्य कमान का सबसे व्यापक पुनर्गठन है. इससे पहले तीनों सेनाओं के बीच केवल तालमेल बैठाने के लिए चेयरमैन जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (सीजेसीएससी) का पद हुआ करता था, जिसे अब पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है. नया कानून सीडीएफ को न केवल तीनों सेनाओं पर पूर्ण परिचालन कमान देता है, बल्कि इसके लिए रक्षा बल मुख्यालय (डीएफएचक्यू) का भी गठन किया गया है. नए ढांचे में प्रधानमंत्री के ठीक नीचे सीडीएफ का पद होगा, जिसके अधीन सभी सेवाओं के प्रमुख काम करेंगे.
सेना का बढ़ता प्रभाव और अन्य अंगों की चिंताएं
इस नए कानून के लागू होने से पाकिस्तान के रक्षा प्रतिष्ठान और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है. सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर जताई जा रही है कि नया ढांचा पूरी तरह से थल सेना केंद्रित हो गया है. नए नियमों के अनुसार, देश के परमाणु-सक्षम बलों की देखरेख करने वाले नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड (सीएनएससी) का प्रमुख केवल थल सेना से ही चुना जाएगा और उसकी नियुक्ति भी सीडीएफ की सिफारिश पर होगी. इस व्यवस्था ने नौसेना और वायु सेना के चार सितारा अधिकारियों के लिए इस शीर्ष पद तक पहुंचने के रास्ते हमेशा के लिए बंद कर दिए हैं.
पूर्व नौसेना अधिकारियों और रणनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि नौसेना और वायु सेना की अपनी विशिष्ट तकनीकी और परिचालन आवश्यकताएं होती हैं. नए निर्णय से इन दोनों सेनाओं की स्वायत्तता और पहचान प्रभावित हो सकती है. नौसेना विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र आधारित परमाणु निरोध और संचार प्रणालियों को समझने के लिए जिस विशेषज्ञता की जरूरत होती है, उसे थल सेना के दृष्टिकोण से संचालित करने में जोखिम हो सकता है.
परमाणु कमान और असैन्य नियंत्रण पर उठते सवाल
नए बदलावों का असर पाकिस्तान के परमाणु नियंत्रण ढांचे पर भी पड़ा है. हालांकि कागजों पर नेशनल कमांड अथॉरिटी (एनसीए) के अध्यक्ष प्रधानमंत्री ही रहेंगे, लेकिन सीडीएफ अब इसके उपाध्यक्ष के रूप में काम करेंगे. जानकारों का कहना है कि औपचारिक रूप से निर्णय लेने का अधिकार भले ही असैन्य सरकार के पास हो, लेकिन व्यावहारिक रूप से परमाणु मामलों में अंतिम शब्द सेना प्रमुख का ही होगा.
कानूनी विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने इस कदम को असैन्य नियंत्रण को कमजोर करने वाला बताया है. संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत सशस्त्र बलों पर अंतिम नियंत्रण केंद्र सरकार का होना चाहिए, लेकिन नए कानून ने अधिकारियों की बर्खास्तगी और सेवानिवृत्ति जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकार सीधे सीडीएफ को सौंप दिए हैं. इसके लिए अब प्रधानमंत्री या कैबिनेट की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी. आलोचकों का मानना है कि इस कदम से पाकिस्तान में असैन्य सरकार की स्थिति और भी औपचारिक बनकर रह जाएगी, जबकि सेना के पास पहले से कहीं अधिक वैधानिक शक्तियां केंद्रित हो जाएंगी.