ऑपरेशन सिंदूर बहस में मनीष तिवारी भी अनुपस्थित
नई दिल्ली । डेस्क: लोकसभा में चल रही ऑपरेशन सिंदूर बहस के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं शशि थरूर और मनीष तिवारी की अनुपस्थिति ने पार्टी के भीतर और बाहर चर्चा का विषय बन गया है. दोनों नेता उन भारतीय प्रतिनिधिमंडलों का हिस्सा थे, जिन्हें सरकार ने पाकिस्तान के प्रचार का मुकाबला करने के लिए 30 से अधिक देशों में भेजा था. हालांकि, सरकार ने कांग्रेस से सलाह लिये बिना इन नेताओं को चुना था.
मनीष तिवारी ने इस मुद्दे पर एक समाचार हेडलाइन को साझा करते हुए ट्वीट किया, जिसमें दावा किया गया था कि सरकार के पक्ष में बोलने के कारण कांग्रेस ने उन्हें और थरूर को बहस से दूर रखा.
तिवारी ने 1970 की फिल्म 'पूरब और पश्चिम' के एक देशभक्ति गीत का हवाला देते हुए लिखा, "है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैं गीत वहाँ के गाता हूँ, भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ. जय हिंद." जब पत्रकारों ने उनके ट्वीट का मतलब पूछा, तो तिवारी ने कहा, "अंग्रेजी में एक कहावत है 'अगर आप मेरी खामोशी को नहीं समझ सकते, तो आप मेरे शब्दों को कभी नहीं समझ पायेंगे.'"
थरूर और तिवारी दोनों ही 2020 में कांग्रेस के उन 23 नेताओं के समूह (जी-23) का हिस्सा थे, जिन्होंने तत्कालीन अंतरिम पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर मजबूत और सक्रिय नेतृत्व के साथ संगठनात्मक सुधार की मांग की थी.
तब से जी-23 के कुछ सदस्य पार्टी छोड़ चुके हैं, कुछ भाजपा में शामिल हो गये हैं, और जो बचे हैं, उन्हें पार्टी में हाशिए पर धकेल दिया गया है.
एक समय गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले थरूर और तिवारी अब पार्टी नेतृत्व से दूरी बनाए हुये प्रतीत होते हैं.
थरूर ने खुलकर स्वीकार किया है कि उनका पार्टी हाईकमान के साथ मतभेद है. हाल के महीनों में, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नीतियों की प्रशंसा की, जो पार्टी को रास नहीं आई. पिछले महीने, जब थरूर के बारे में पूछा गया, तो कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने टिप्पणी की, "कुछ लोगों के लिए मोदी पहले हैं, हमारे लिए देश पहले है."
कुछ पार्टी नेताओं का मानना है कि थरूर ने पहले ही 'लक्ष्मण रेखा' पार कर ली है. केरल कांग्रेस इकाई ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि वे उनके साथ सहयोग नहीं करेंगे, जबकि केंद्रीय नेतृत्व उनके भविष्य पर विचार कर रहा है.
ऑपरेशन सिंदूर बहस में अपनी अनुपस्थिति पर पूछे गये सवाल पर थरूर का जवाब रहस्यमयी था: "मौनव्रत."
लेकिन एक मुखर नेता के लिये यह सवाल उठता है कि यह खामोशी कब तक बरकरार रहेगी?