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ओडिशा HC: दूसरी शादी के बच्चों को पैतृक संपत्ति में सीमित हक

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25 अक्टू. 2025, 02:48 PM 4 मिनट में पढ़ें 1

हाईकोर्ट
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भुवनेश्वर । डेस्क: हिंदू कानून में संपत्ति के बंटवारे को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला आया है. ओडिशा हाईकोर्ट ने हाल ही में एक मामले में स्पष्ट किया है कि किसी हिंदू पति की पहली (वैध) और दूसरी (शून्यीय) शादी से पैदा हुए बच्चे दोनों उसके पैतृक संपत्ति में हिस्सा पा सकते हैं. हालांकि, दूसरी शादी के बच्चों का हक उनके माता-पिता के हिस्से तक सीमित रहेगा, जो पिता की मृत्यु से ठीक पहले एक काल्पनिक विभाजन (नोटिशनल पार्टिशन) के आधार पर तय होगा. यह फैसला न केवल परिवारिक विवादों को सुलझाने में मददगार साबित होगा, बल्कि निर्दोष बच्चों के अधिकारों की रक्षा भी करेगा.


यह फैसला संध्या रानी साहू उर्फ मोहंती बनाम अनुसाया मोहंती मामले (एमएटीए नंबर 04/2024) में 2 अप्रैल 2025 को आया. मामले की शुरुआत 2017 में हुई, जब पहली पत्नी अनुसाया मोहंती ने फैमिली कोर्ट, भुवनेश्वर में याचिका दायर की. उन्होंने दावा किया कि उनकी शादी 5 जून 1966 को हिंदू रीति-रिवाज से कैलाश चंद्र मोहंती से हुई थी. दंपति के दो बेटे हुए और वे पति-पत्नी की तरह साथ रहे. अनुसाया ने आरोप लगाया कि संध्या रानी साहू, जो पति की नर्स थीं, का उनके साथ कोई वैध वैवाहिक संबंध नहीं था.


फैमिली कोर्ट ने 29 अक्टूबर 2021 को अनुसाया को पति की कानूनी पत्नी और वारिस घोषित किया, जिससे उन्हें पैतृक और स्व-अर्जित संपत्ति में हक मिला. इससे नाराज संध्या ने ओडिशा हाईकोर्ट में अपील की (एमएटीए नंबर 96/2021). उन्होंने तर्क दिया कि कोविड-19 महामारी के कारण उनके वकीक की मृत्यु हो गई थी, जिससे वे सुनवाई से अनजान रहीं और बिना मौके के फैसला हो गया. हाईकोर्ट ने 13 जुलाई 2023 को संध्या के पक्ष में फैसला सुनाया, मामले को फैमिली कोर्ट में वापस भेजा और अंतरिम व्यवस्था की. दोनों पक्षों की उम्र को देखते हुए (अनुसाया करीब 80 वर्ष, संध्या 70 वर्ष), संपत्ति से होने वाली आय 60:40 के अनुपात में बांटी गई-60% अनुसाया को और 40% संध्या को.


फैमिली कोर्ट ने दोबारा सुनवाई कर 12 दिसंबर 2023 को अनुसाया को फिर से कानूनी पत्नी घोषित किया. संध्या ने फिर अपील की. हाईकोर्ट ने तीन मुख्य मुद्दों पर विचार किया: (1) क्या फैमिली कोर्ट में याचिका दायर करना सही था या सिविल कोर्ट जाना चाहिए था? (2) क्या मामला समय-सीमा से बाहर था? (3) क्या संध्या के बच्चों को संपत्ति से वंचित करना हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16 का उल्लंघन है?


तीसरे मुद्दे पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16 शून्यीय या शून्य विवाह से जन्मे बच्चों को वैधता प्रदान करती है, लेकिन धारा 16(3) उनके अधिकारों को सीमित रखती है. ये बच्चे माता-पिता की स्व-अर्जित संपत्ति और संयुक्त परिवारिक संपत्ति में माता-पिता के हिस्से तक ही हकदार हैं. सुप्रीम कोर्ट के रेवणासिद्धप्पा बनाम मल्लिकार्जुन (2023 लाइव लॉ (एससी) 737) फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6(3) के तहत पिता की मृत्यु से पहले काल्पनिक विभाजन मानकर उनके हिस्से का निर्धारण किया जाएगा. उसके बाद ही बच्चे अपना हिस्सा पा सकेंगे.


हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में संशोधन किया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि संध्या के बच्चे कैलाश की स्व-अर्जित संपत्ति में पूर्ण हकदार हैं और पैतृक संपत्ति में उनके पिता के काल्पनिक हिस्से तक सीमित अधिकार रखते हैं. अन्य दलीलों को खारिज करते हुए अपील खारिज कर दी गई.


कानूनी विशेषज्ञों ने इसे स्वागतयोग्य बताया. दीवान पीएन चोपड़ा एंड कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर ध्रुव चोपड़ा ने ईटी वेल्थ ऑनलाइन को कहा, "यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के रेवणासिद्धप्पा निर्णय पर आधारित है, जो शून्यीय विवाह के बच्चों को पैतृक संपत्ति में माता-पिता के हिस्से तक हक देता है. काल्पनिक विभाजन की अवधारणा से यह सुनिश्चित होता है कि न्याय मिले."


एसएनजी एंड पार्टनर्स की सीनियर पार्टनर अंजू गांधी ने कहा, "यह नया सिद्धांत नहीं, बल्कि स्थापित कानून को मजबूत करता है. धारा 16(3) स्पष्ट करती है कि वैधता केवल माता-पिता की संपत्ति तक सीमित है. सुप्रीम कोर्ट ने जिनिया कीटन और भारत माता मामलों को दरकिनार कर यह स्पष्ट किया. इससे निर्दोष बच्चों को न्याय मिलेगा, लेकिन जटिल परिवारों में वसीयत या ट्रस्ट जैसी योजना जरूरी है, जो मुकदमेबाजी से बचाए."


यह फैसला हिंदू परिवारों में बहुविवाह या अनियमित संबंधों से उपजे विवादों को सुलझाने में मील का पत्थर साबित होगा. इससे संपत्ति बंटवारे में समानता आएगी, लेकिन सीमित अधिकारों से पहली पत्नी के हित भी सुरक्षित रहेंगे. विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अन्य राज्यों में भी मिसाल बनेगा, जिससे हजारों परिवारों को लाभ होगा.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP