कांगो में इबोला का नया रूप: जानवरों से फैला स्ट्रेन, 2000 से अधिक की मौत
नई दिल्ली । डेस्क: डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ द कांगो (डीआरसी) और उसके पड़ोसी देशों में इस समय इबोला वायरस का बेहद भयानक और अब तक का सबसे तेज फैलने वाला प्रकोप जारी है. चिकित्सा पत्रिका 'नेचर मेडिसिन' में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, यह तबाही किसी पुराने वायरस के दोबारा सक्रिय होने से नहीं, बल्कि जानवरों से इंसानों में हुए वायरस के नए प्रसार यानी 'ज़ूनोटिक स्पिलओवर' के कारण शुरू हुई है.
पूर्वी डीआरसी में इस वायरस की चपेट में आने से 4,449 से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से 2,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. स्वास्थ्य अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि स्थिति पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो यह मानव इतिहास की सबसे जानलेवा इबोला आपदा बन सकती है.
जेनेटिक जांच से खुला शुरुआती तबाही का राज
अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने डीआरसी और युगांडा के मरीजों के नमूनों का आनुवंशिक विश्लेषण किया. इसमें पाया गया कि वर्तमान प्रकोप 'बुंडीबुग्यो' (Bundibugyo) स्ट्रेन का परिणाम है, जो वर्ष 2007 और 2012 के पुराने वेरिएंट्स से काफी अलग है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने आधिकारिक रूप से मई में इस महामारी की घोषणा की थी, लेकिन जेनेटिक सीक्वेंसिंग से पता चला कि यह घातक वायरस वास्तव में फरवरी से ही गुपचुप तरीके से लोगों के बीच फैल रहा था.
विशेषज्ञों का कहना है कि महीनों की देरी के कारण वायरस को कई संक्रमण श्रृंखलाएं बनाने का मौका मिल गया, जिससे इसे समय रहते पहचानना और रोकना बेहद मुश्किल हो गया.
क्यों खतरनाक साबित हो रहा है बुंडीबुग्यो स्ट्रेन
संक्रामक रोग विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि वायरस का जानवरों से इंसानों में आना ही इसे खतरनाक नहीं बनाता, बल्कि एक बार इंसानों में प्रवेश करने के बाद इसका मानव-से-मानव में तेजी से प्रसार होना असली चिंता का विषय है. इससे पहले पश्चिम अफ्रीका में तबाही मचाने वाला इबोला का प्रकोप 'ज़ैरे' स्ट्रेन के कारण था, जिसके लिए चिकित्सा जगत के पास पहले से प्रभावी टीके और दवाइयां मौजूद थीं.
इसके विपरीत, बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ अब तक कोई भी स्वीकृत टीका या विशिष्ट एंटीवायरल उपचार उपलब्ध नहीं है. वर्तमान में डॉक्टरों के पास मरीजों को बचाए रखने के लिए केवल तरल पदार्थ देना, शॉक का इलाज करना और सहायक देखभाल (सपोर्टिव केयर) ही एकमात्र रास्ता बचा है.
स्वास्थ्यकर्मियों पर मंडराता संकट और स्थानीय चुनौतियां
इस महामारी से निपटने के अग्रिम मोर्चे पर डटे स्वास्थ्यकर्मी खुद भी भारी जोखिम में हैं. अब तक 100 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी इस वायरस से संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें से लगभग 35 डॉक्टरों और नर्सों की मौत हो चुकी है. इसके अलावा, डीआरसी में जमीनी स्तर पर राहत कार्यों को कई बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है.
बकाया वेतन को लेकर स्वास्थ्यकर्मियों की हड़ताल, बीमारी से जुड़ी तरह-तरह की अफवाहें और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराएं इस संकट को और गहरा बना रही हैं. खास तौर पर खुले ताबूतों में अंतिम संस्कार करने की प्रथा से संक्रमण के और अधिक फैलने का खतरा बना हुआ है.
वैश्विक स्तर पर सतर्कता और यात्रा प्रतिबंध
प्रकोप के खतरनाक रुख को देखते हुए दुनिया के कई देशों ने कड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं. रवांडा और युगांडा जैसे पड़ोसी देशों ने सीमा सुरक्षा और स्वास्थ्य जांच बेहद सख्त कर दी है. बहरीन ने कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान से आने वाले विदेशी यात्रियों के प्रवेश पर 30 दिनों का प्रतिबंध लगा दिया है.
अमेरिका ने भी घोषणा की है कि 21 दिनों के भीतर कांगो की यात्रा करने वाले यात्रियों को अमेरिका जाने वाली वाणिज्यिक उड़ानों में सवार होने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
वहीं, एशियाई देशों ने भी हवाई अड्डों पर थर्मल स्क्रीनिंग और क्वारंटीन व्यवस्था को मजबूत करना शुरू कर दिया है. डब्ल्यूएचओ ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रभावित क्षेत्रों में कई टन व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई किट) और चिकित्सा सामग्रियां भेजी हैं.