शनि, 17 अक्टू. 2026

CGKhabar

नेपाल में दक्षिण एशिया का सबसे भारी टैक्स ढांचा: नये बजट से राहत की आस

C

CG Khabar

21 मई 2026, 07:01 PM 5 मिनट में पढ़ें 1

बालेन्द्र शाह
बालेन्द्र शाह

काठमांडू । डेस्क: दक्षिण एशिया में सबसे कम प्रति-व्यक्ति आय वाले देशों में शुमार नेपाल के कामकाजी और मध्यम वर्ग पर करों (टैक्स) का भारी बोझ है, जबकि इसके बदले में उन्हें मिलने वाली सार्वजनिक सेवाएं बेहद बदहाल हैं. देश में व्यक्तिगत आयकर की अधिकतम दर इस समय 39 प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है, जो पूरे क्षेत्र में सबसे ज्यादा है.


आगामी 29 मई को राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के नेतृत्व वाली पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार का बजट आने वाला है. अर्थशास्त्री और वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वागले द्वारा इस पारंपरिक बजट से हटकर मध्यम वर्ग को बड़ी राहत देने की उम्मीद जताई जा रही है, क्योंकि वे खुद भी मौजूदा टैक्स ढांचे में बदलाव के मुखर समर्थक रहे हैं.


विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च कर दरों से अधिक राजस्व प्राप्त होने की धारणा पूरी तरह भ्रामक है. चार्टर्ड अकाउंटेंट और कर विशेषज्ञ सुदर्शनराज पांडेय के अनुसार, इस 39 प्रतिशत की उच्चतम दर से सरकार को केवल 4 से 5 अरब रुपये का ही राजस्व प्राप्त होता है. आंतरिक राजस्व विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2024-25 में मात्र 11,000 करदाताओं ने 30 प्रतिशत या उससे अधिक की दर से कर भुगतान किया, जिससे लगभग 1 अरब रुपये का राजस्व मिला. इससे साफ होता है कि अत्यधिक टैक्स दरों से कर का आधार सिकुड़ जाता है, क्योंकि लोग अपनी आय छिपाने के रास्ते खोजने लगते हैं.


नेपाल में वर्तमान में छह व्यक्तिगत आयकर स्लैब लागू हैं. व्यक्तिगत रूप से 5 लाख रुपये और दंपतियों के लिए 6 लाख रुपये तक की वार्षिक आय को टैक्स से मुक्त रखा गया है. हालांकि, सबसे निचले स्लैब में आने वाले वेतनभोगी कर्मचारियों को भी 1 प्रतिशत सामाजिक सुरक्षा कर देना पड़ता है, जो पेंशन आय या योगदान-आधारित सामाजिक सुरक्षा कोष पर लागू नहीं होता. इसके बाद, 5 लाख से 7 लाख रुपये की आय पर 10 प्रतिशत, 7 लाख से 10 लाख रुपये पर 20 प्रतिशत, 10 लाख से 20 लाख रुपये पर 30 प्रतिशत, 20 लाख से 50 लाख रुपये पर 36 प्रतिशत और 50 लाख रुपये से अधिक की वार्षिक आय पर सीधे 39 प्रतिशत टैक्स वसूला जाता है. 


भारत, श्रीलंका और मालदीव जैसे पड़ोसी देशों की तुलना में नेपाल में कर छूट की यह सीमा बेहद कम है.


नेपाल की इस कर प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि दरें ऊंची हैं, बल्कि चिंता इस बात की है कि इसके बदले नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही हैं. सरकारी अस्पतालों में गुणवत्तापूर्ण इलाज की कमी है, सरकारी स्कूलों पर जनता का भरोसा नहीं है और सड़कें, सीवरेज, सार्वजनिक परिवहन तथा प्रशासनिक सेवाएं पूरी तरह बदहाल हैं. लचर स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के कारण मध्यम वर्ग को भारी टैक्स चुकाने के बाद भी अपनी जेब से शिक्षा और स्वास्थ्य पर भारी खर्च करना पड़ रहा है. 


पूर्व सरकारी सचिव और कर प्रशासन विशेषज्ञ लक्ष्मण अर्याल का कहना है कि बुनियादी सुविधाओं के बिना भारी टैक्स वसूलने से कर चोरी और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है. लोग या तो अपने काम के घंटे कम कर देते हैं या फिर कर बचाने के अवैध तरीके ढूंढने लगते हैं.


विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि सरकार को अनिवार्य कर की सीमा बढ़ानी चाहिए और कर दरों को कम करके टैक्स का दायरा बढ़ाना चाहिए. अर्याल ने सलाह दी है कि वर्तमान में 7.5 प्रतिशत की शेयर ट्रेडिंग और पूंजीगत लाभ कर (कैपिटल गेन्स टैक्स) को लेनदेन की मात्रा के आधार पर बढ़ाकर 15 से 20 प्रतिशत किया जा सकता है. 


वहीं, सुदर्शनराज पांडेय ने भारत का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के बाद अप्रत्यक्ष कर की दरें 55 प्रतिशत से घटकर अधिकतम 24 प्रतिशत रह गईं, लेकिन कर का आधार बढ़ने से कुल राजस्व में कोई गिरावट नहीं आई. नेपाल खुद की तुलना यूरोपीय देशों से नहीं कर सकता, क्योंकि वे देश टैक्स के बदले मजबूत सामाजिक सुरक्षा और बेहतरीन सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करते हैं.


कर विशेषज्ञ रूप खड़का का भी मानना है कि नेपाल में व्यक्तिगत आयकर की वैधानिक और प्रभावी दरें दक्षिण एशिया में सबसे ऊंची हैं. 1990 के दशक में हुए पहले दौर के कर सुधारों के दौरान टैक्स प्रणाली को सरल बनाकर केवल 15 और 25 प्रतिशत के दो स्लैब रखे गए थे, लेकिन वर्तमान ढांचा फिर से जटिल हो गया है. उन्होंने वेतनभोगी कर्मचारियों के असंतोष को दूर करने के लिए 1 प्रतिशत के सामाजिक सुरक्षा कर को तुरंत समाप्त करने की वकालत की है. 


दक्षिण एशिया के अन्य देशों पर नजर डालें तो भारत में अधिकतम दर 30 प्रतिशत (अधिभार अलग), श्रीलंका में 36, पाकिस्तान में 35, भूटान में 30, बांग्लादेश में 25, अफगानिस्तान में 20 और मालदीव में महज 15 प्रतिशत है. वित्त मंत्री वागले ने भी हाल ही में 'कांतिकर इकोनॉमिक समिट 2026' में माना कि मध्यम वर्ग को बचाना देश की समृद्धि के लिए आवश्यक है. 


अब पूरे देश की नजरें 29 मई के बजट पर टिकी हैं कि क्या सरकार इस भारी-भरकम टैक्स प्रणाली को दुरुस्त कर जनता को राहत दे पाएगी या नहीं.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP