आपातकाल में नेपाल की कृषि को भारत का ही सहारा
काठमांडू । डेस्क: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में पैदा हुए अभूतपूर्व संकट के बीच नेपाल की कृषि व्यवस्था गहरे संकट में घिर गई है. इस आपातकालीन स्थिति में नेपाल के कृषि क्षेत्र और लाखों किसानों को उबारने के लिए पड़ोसी देश भारत ही एकमात्र सहारा बनकर उभरा है. वैश्विक बाजार में रासायनिक उर्वरकों की आसमान छूती कीमतों और आपूर्ति की अनिश्चितता को देखते हुए नेपाल सरकार ने भारत से आपातकालीन खाद खरीदने की प्रक्रिया को युद्ध स्तर पर तेज कर दिया है.
नेपाल के मंत्रिमंडल ने आगामी धान सीजन को ध्यान में रखते हुए बीते 4 मई को भारत से खाद आयात करने की योजना को मंजूरी दी थी. इसके तहत नेपाल सरकार ने भारत की सरकारी कंपनी राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (RCF) से मूल्य निर्धारण और दरों का विवरण मांगा है.
संकट की घड़ी में भारत का रुख
नेपाल के कृषि और पशुधन विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव राम कृष्ण श्रेष्ठ के अनुसार, नेपाल को इसी सप्ताह भारत से मूल्य सूची मिलने की पूरी उम्मीद है. दरों की समीक्षा करने के तुरंत बाद नेपाल औपचारिक रूप से ऑर्डर दे देगा. हालांकि, सामान्य नियमों के तहत भारतीय कंपनी ने भुगतान के बाद 120 दिनों के भीतर डिलीवरी का आश्वासन दिया है, लेकिन नेपाल में धान की खेती का सीजन सिर पर होने के कारण इसे एक राष्ट्रीय आपातकाल माना जा रहा है. इसी वजह से नेपाल ने भारत से विशेष अनुरोध किया है कि इस कठिन समय में आपूर्ति की अवधि को कम किया जाए ताकि मानसून की शुरुआत से पहले खाद नेपाल के खेतों तक पहुंच सके.
बजट की कमी और भारत से द्विपक्षीय सहयोग
नेपाल सरकार ने शुरुआत में अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत से 1 लाख 50 हजार टन खाद की मांग की थी. लेकिन देश के आर्थिक संकट और बजटीय सीमाओं के कारण इस मात्रा को घटाकर 80 हजार टन करना पड़ा. नेपाल कृषि इनपुट्स कंपनी को इस एकमुश्त आपातकालीन खरीद के लिए सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है. यह पूरी प्रक्रिया दोनों देशों के बीच साल 2022 में हुए ऐतिहासिक द्विपक्षीय समझौते (G2G) के तहत की जा रही है, जो संकट के समय नेपाल के लिए जीवनदायिनी साबित हुआ है. इस खेप में 60,000 टन यूरिया और 20,000 टन डाई-अमोनियम फास्फेट (DAP) शामिल है. इस खाद का मुख्य उपयोग धान की रोपाई के 25 से 30 दिनों बाद 'टॉप-ड्रेसिंग' चरण में किया जाएगा, जो फसल की पैदावार के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय होता है.
वैश्विक टेंडर की विफलता और समय की कमी
नेपाल के लिए भारत से यह मदद इसलिए भी अपरिहार्य हो गई है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए टेंडर जारी करने की प्रक्रिया बेहद जटिल और समय लेने वाली है. अधिकारियों के मुताबिक, अगर नेपाल इस समय वैश्विक टेंडर जारी करता है, तो खाद आने में कम से कम 225 दिनों का समय लगेगा. कृषि कैलेंडर के अनुसार किसानों के पास इतना समय नहीं है. जून से नेपाल में धान की रोपाई शुरू हो जाती है, जिसे टाला नहीं जा सकता. वर्तमान में नेपाल कृषि इनपुट्स कंपनी के पास केवल 1 लाख 71 हजार टन का स्टॉक बचा है, जबकि चालू अनुबंधों में से लगभग 94,450 टन के ठेके आपूर्तिकर्ताओं की विफलता के कारण रद्द होने की कगार पर हैं. ऐसे में भारत से त्वरित आपूर्ति ही नेपाल को बड़े कृषि संकट से बचा सकती है.
नेपाल की खाद्य सुरक्षा और धान का महत्व
नेपाल के लिए धान सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है. चावल नेपाल का मुख्य भोजन है, जो देश के कुल अनाज उपभोग का लगभग 67 प्रतिशत और कैलोरी इनटेक का आधे से अधिक हिस्सा पूरा करता है. नेपाल में प्रति व्यक्ति वार्षिक चावल की खपत 137.5 किलोग्राम है. ऐसे में यदि भारत से समय पर खाद नहीं मिलती है, तो इसका सीधा असर फसल की पैदावार पर पड़ेगा. पैदावार घटने से अनाज की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी और किसानों की आय में भारी गिरावट आएगी.
आसमान छूती कीमतें और सब्सिडी का भारी बोझ
वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के कारण खाद की अंतरराष्ट्रीय कीमतें नेपाल की क्रय शक्ति से बाहर हो चुकी हैं. नेपाल सरकार ने चालू वित्त वर्ष में उर्वरक आयात पर सब्सिडी के लिए 28.82 अरब रुपये आवंटित किए थे, जिसका लक्ष्य 5 लाख 50 हजार टन खाद खरीदना था. लेकिन बढ़ती कीमतों के कारण अब इतने बजट में केवल 4 लाख 40 हजार टन खाद ही आ पा रही है. वर्तमान में नेपाल सरकार अपने किसानों को भारी सब्सिडी दे रही है. सहकारी समितियों के माध्यम से यूरिया 18 रुपये प्रति किलोग्राम (92% सब्सिडी) और डीएपी 46 रुपये प्रति किलोग्राम (80% सब्सिडी) की दर से बेचा जा रहा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी वास्तविक कीमतें क्रमशः 160 रुपये और 162 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास हैं.
मौसम की मार और भावी चुनौतियां
नेपाल की कृषि पर इस बार दोहरी मार पड़ने की आशंका है. मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि लगातार तीन वर्षों की अच्छी बारिश के बाद इस साल नेपाल में सामान्य से कम मानसून रहने की संभावना है. चूंकि नेपाल की 80 प्रतिशत सिंचाई मानसून के पानी पर निर्भर है, इसलिए कम बारिश और खाद की किल्लत का यह संयोजन देश की कृषि को पूरी तरह से पंगु बना सकता है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने भी चेतावनी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण साल 2026 की दूसरी छमाही और 2027 में वैश्विक खाद्य आपूर्ति प्रभावित होगी. इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच, नेपाल की कृषि और उसकी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए भारत की ओर से मिलने वाली यह आपातकालीन मदद ही एकमात्र उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है.