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सत्ता परिवर्तन की जरूरत अमेरिका में है: एक विश्लेषण

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26 मार्च 2026, 10:37 AM 5 मिनट में पढ़ें 1

अमेरिका
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त्वरित टिप्पणी । जेके कर: जी हां, वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि सत्ता परिवर्तन की जरूरत ईरान में नहीं, बल्कि अमेरिका में है. गौरतलब है कि दक्षिण अफ्रीका स्थित ईरानी दूतावास ने हाल ही में राष्ट्रपति का मज़ाक उड़ाने वाले व्यंग्यात्मक संदेशों को साझा किया है, साथ ही एक अन्य उपयोगकर्ता की उस पोस्ट को भी आगे बढ़ाया है जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “सत्ता परिवर्तन की ज़रूरत अमेरिका में है, ईरान में नहीं”. 


यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो दुनिया में अस्थिरता का केंद्र अमेरिका ही नजर आता है. अमेरिका के नेतृत्व ने अपनी आक्रामक नीतियों से दुनिया भर में त्राहि-मचा रखी है. प्रश्न यह उठता है कि जब ईरान कूटनीतिक बातचीत के रास्ते पर था, तब उस पर सैन्य प्रहार करने की क्या आवश्यकता थी? 

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अमेरिकी नेतृत्व द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़े गए इस अघोषित युद्ध ने करीब-करीब पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. अमेरिका और इज़रायल लगातार ईरान से जुड़े ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई कर रहे हैं, जिसकी चिंगारी अब अन्य देशों तक पहुँच चुकी है.


अमेरिका तथा इज़रायल की इस सैन्य आक्रामकता से विवश होकर ईरान ने 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Hormuz Strait) को लगभग बंद कर दिया है. ईरान अब केवल गिने-चुने देशों के तेल टैंकरों को ही वहां से गुजरने की अनुमति दे रहा है. अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर इस तरह 'फ्री फ्लो' (स्वतंत्र आवाजाही) बाधित होने से वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहरा गया है. 


इसके परिणामस्वरूप भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है. इस महंगाई का सीधा कारण आपूर्ति में कमी और युद्ध का भय है. भारत में भी इसका असर स्पष्ट दिख रहा है; रसोई गैस के दाम बढ़ा दिए गए हैं और आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए बुकिंग के नियमों में सख्ती कर दी गई है. शहरी क्षेत्रों में 25 दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में 45 दिन के अंतराल पर ही नई बुकिंग स्वीकार की जा रही है. 


घरेलू उपभोक्ताओं के अलावा व्यावसायिक क्षेत्र पर भी इसकी मार पड़ी है. होटलों और कैटरर्स द्वारा उपयोग किए जाने वाले नीले सिलेंडरों की भारी किल्लत हो गई है, जिससे पर्यटन और खाद्य उद्योग संकट में है. कई स्थानों पर तो लोग मजबूरी में लकड़ी और कोयले के पारंपरिक ईंधन की ओर लौटने को विवश हैं.


पड़ोसी देशों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है. पाकिस्तान में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे वहां की जनता सड़क पर है. नेपाल में रसोई गैस की राशनिंग शुरू कर दी गई है और आपूर्ति बनाए रखने के लिए केवल 10 किलो गैस वाले सिलेंडर ही दिए जा रहे हैं. 


भारत में एलपीजी के व्यावसायिक सिलेंडरों की कमी के कारण सूक्ष्म और लघु उद्योग बंदी की कगार पर पहुँच गए हैं, जिससे बेरोजगारी दर में भारी इजाफा होना तय है. इस ऊर्जा संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में असुरक्षा की भावना भर दी है, जिसके कारण लोग पैनिक होकर ईंधन का भंडारण कर रहे हैं. 


निजी क्षेत्र की तेल कंपनियों, जैसे नायरा एनर्जी ने भी कीमतों में अचानक बढ़ोतरी कर दी है. यह पूरा संकट किसी ईरानी उकसावे का परिणाम नहीं है, बल्कि अमेरिका और इज़रायल द्वारा उठाए गए कदमों की प्रतिक्रिया है.


यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह संकट ईरान के सर्वोच्च नेताओं के कारण पैदा नहीं हुआ है, बल्कि यह अमेरिका-इज़रायल के हमलों के बाद ईरान द्वारा उठाए गए रक्षात्मक कदमों का परिणाम है. यह आरोप लगाना आसान है कि ईरान की कार्रवाइयां ऊर्जा संकट को जन्म दे रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे ईरान के पास विकल्प क्या है? 


दशकों से लगे अमेरिकी प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को पहले ही जर्जर कर दिया है. वहां मुद्रास्फीति चरम पर है और ईरानी मुद्रा (रियाल) का मूल्य लगातार गिर रहा है. 


यह स्थिति वैसी ही है जैसे किसी बिल्ली को कमरे में बंद करके मारना; जब बिल्ली अपनी जान बचाने के लिए पलटवार करती है, तो उसे ही हमलावर करार दिया जाता है. 


इस संकट की जड़ में अमेरिका की 'सत्ता परिवर्तन' (Regime Change) की नीति है, जिसे इज़रायल का पूर्ण समर्थन प्राप्त है. रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नेताओं की हत्याएं और राजनयिक मर्यादाओं का उल्लंघन अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाने जैसा है. क्या इस तरह की अराजकता फैलाने वाले नेतृत्व को अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा रोका नहीं जाना चाहिए?


ईरान के अलावा अमेरिका की दमनकारी नीतियों का शिकार क्यूबा भी है. वहां वेनेजुएला से होने वाली तेल आपूर्ति को अमेरिकी दबाव में बाधित कर दिया गया है. अमेरिका क्यूबा में भी अपनी पसंद की सरकार थोपना चाहता है. इसके कारण क्यूबा में बिजली और परिवहन का गंभीर संकट पैदा हो गया है, जिससे आम जनता को भोजन तक की कटौती करनी पड़ रही है. 


इसी तरह, वेनेजुएला के संदर्भ में भी अमेरिका का व्यवहार औपनिवेशिक रहा है, जहां निर्वाचित नेतृत्व को अस्थिर करने के लिए हर संभव अवैध हथकंडा अपनाया गया. किसी संप्रभु राष्ट्र के आंतरिक मामलों में इस तरह का हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय संधियों का खुला उल्लंघन है. 


अंततः, यह स्पष्ट है कि यदि वाशिंगटन में कोई अधिक संतुलित और शांतिप्रिय नेतृत्व होता, तो दुनिया आज इस वैश्विक संकट और युद्ध की विभीषिका से नहीं जूझ रही होती. इसलिए, आज का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दुनिया की सुरक्षा के लिए स्वयं अमेरिका में सत्ता परिवर्तन अनिवार्य नहीं हो गया है?

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP