वन भैंसों के नाम पर छत्तीसगढ़ वन विभाग में नारकोटिक ड्रग की हेराफेरी
छत्तीसगढ़ वन विभाग द्वारा वन भैंसों के नाम पर नारकोटिक ड्रग की हेराफेरी
रायपुर | संवाददाताः जिस फेंटानाईल नामक नशे की ड्रग को लेकर अमरीका का कनाडा, मेक्सिको और चीन के साथ ट्रेड वार चालू हुआ वो मॉर्फिन से सिर्फ 50 गुना शक्तिशाली होती है.
परन्तु जिस एटॉर्फिन नाम की एक नारकोटिक ड्रग की छत्तीसगढ़ वन विभाग में हेराफेरी का मामला सामने आया है, वह मॉर्फिन से 3000 गुना ज्यादा शक्तिशाली होती है.
एटॉर्फिन को बड़े वन्य जीवों को बेहोश करने के काम में लाया जाता है.
सिर्फ 1.3 मिलीलीटर की खुराक का इंजेक्शन देने से हाथी बेहोश हो जाता है. वहीं 0.8 मिलीलीटर से वन भैंसा.
यह नारकोटिक ड्रग्स ऐंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 यानी मादक-द्रव्यों एंव मनोउत्तेजक पदार्थ अधिनियम 1985 के तहत अधिसूचित ड्रग है.
बिना लाइसेंस के इसे प्राप्त कर उपयोग करना और लाइसेंस होने पर शर्तों का पालन नहीं करना अपराध की श्रेणी में आता है.
इसके बारे में कहा जाता है कि इसे सूंघने से या चमड़ी पर गिरने से भी मनुष्य की मौत हो सकती है.
मॉर्फिन से 3000 गुना शक्तिशाली होने के कारण इस नारकोटिक ड्रग की कीमत ब्लैक मार्केट में प्रति एमएल लाखों तक आंकी जाती है.
अफ्रीका से आयात कर यह दवा यहां लाईी जाती है.
वन भैंसों के नाम पर एटॉर्फिन और ऐसी ही अन्य ड्रग्स को लेकर छत्तीसगढ़ वन विभाग पर व्यापक हेराफेरी का आरोप लग रहा है.
जिसमें बिना लाइसेंस के यह ड्रग प्राप्त करना, बिना अनुमति के दूसरों को देना और लाइसेंस मिलने के बाद भी बिना डायरेक्टर जंगल सफारी (लाइसेंसी) की जानकारी के, प्रधान मुख्य वन संरक्षक के आदेश पर, वन्यप्राणी चिकित्सक द्वारा स्टॉक से निकालना और उपयोग से ज्यादा खपत बताना शामिल है.
आरोप है कि छत्तीसगढ़ वन विभाग द्वारा लाइसेंस की शर्तो का उलंघन करते हुए इस ड्रग का उपयोग किया गया है.
वन्यजीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने शासन से पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कर डायरेक्टर जनरल नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो को पूरा मामला सौंपने की मांग की है.
बिना लाइसेंस के एटॉर्फिन प्राप्त करना और दूसरे राज्य को देना
इस पूरे मामले पर छानबीन करने पर पता चलता है कि वर्ष 2019-20 में छत्तीसगढ़ वन विभाग के पास छत्तीसगढ़ में एटॉर्फिन और ऐसी कोई दूसरी दवा रखने और उपयोग में लाने का कोई लाइसेंस ही नहीं था.
इसके बावजूद दुधवा टाइगर रिज़र्व से और भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून से जनवरी और फ़रवरी 2020 में 10 मिलीलीटर एटॉर्फिन बुलाया गया.
फ़रवरी 2020 में वन विभाग ने असम के मानस टाइगर रिज़र्व में छत्तीसगढ़ लाने के लिए दो वन भैंसे पकडे.
एक वन भैंसे को बेहोश करने में अधिकतम 0.8 एमएल एटॉर्फिन लगता है.
इस प्रकार दो वन भैंसों के लिए कुल 1.6 एमएल एटॉर्फिन की जरुरत हो सकती है.
परन्तु स्टॉक रजिस्टर में असम से 2020 में वन भैंसा पकड़ने के नाम पर 7.8 एमएल एटॉर्फिन निकालना बताया गया.
इस प्रकार 6.2 एमएल की खपत ज्यादा बताई गई.
असम में उपयोग की गई 7.8 एमएल एटॉर्फिन के उपयोग के बारे में बताया गया कि उपयोग की गई औषधि से सम्बंधित जानकारी मानस टाइगर रिज़र्व असम के पास है.
जंगल सफारी डायरेक्टर का कहना है कि दूसरे राज्य को एटॉर्फिन देने के मामले में उच्च अधिकारियों द्वारा या जंगल सफारी डायरेक्टर द्वारा कोई आदेश जारी नहीं किया गया है.
दूसरी तरफ असम को एटॉर्फिन हैण्ड ओवर करने की कोई पावती नहीं है और उन्हें नहीं पता कि असम को कितनी मात्रा में एटॉर्फिन दी गई.
लाइसेंस की शर्तों की धज्जियां उड़ीं
जंगल सफारी के डायरेक्टर के नाम से पहली बार छत्तीसगढ़ आबकारी विभाग ने अगस्त 2021 में एटॉर्फिन और अन्य ड्रग के इस्तेमाल को लेकर लाइसेंस जारी किया.
अनिवार्य शर्त थी कि सिर्फ जंगल सफारी परिसर में इन दवाओं का उपयोग होगा अन्यत्र नहीं.
दूसरी शर्त थी कि जंगल सफारी डायरेक्टर ड्रग अनुमोदित चिकित्सक से नुस्खा (प्रिस्क्रिप्शन) प्राप्त होने के बाद ही यह दवा देंगे और प्रिस्क्रिप्शन रिकॉर्ड में रखेंगे.
शर्तों की पूरी जानकारी होने के बाद भी मार्च 2023 में वर्तमान मुख्य वन्यप्राणी संरक्षक द्वारा असम से चार और वन भैंसा लाने के लिए कमेटी गठन करने का आदेश जारी किया गया.
जिसमें वन्यप्राणी चिकित्सकों का नाम लेकर आदेशित किया गया कि वन्यप्राणी चिकित्सक बेहोश करने की दवा अपने साथ ले कर जायेंगे.
वन्यप्राणी चिकित्सक नियमों को दरकिनार करते हुए जंगल सफारी डायरेक्टर को कोई प्रिस्क्रिप्शन दिये बिना ड्रग्स ले कर निकल गये.
वहां चार वन भैसों को बेहोश करने के लिए 2.50 एमएल एटॉर्फिन का उपयोग किया गया, परन्तु स्टॉक में 3.2 एमएल निकालना बताया गया. यानि 0.7 एमएल अधिक.
इस प्रकार से एटॉर्फिन सहित दूसरी ड्रग्स कई बार विभिन्न जिलों में हाथियों को बेहोश करने के लिए भी स्टॉक से निकली गईं.
जंगल सफारी के दस्तावेज बताते हैं कि डायरेक्टर जंगल सफारी के पास एक भी प्रिस्क्रिप्शन उपलब्ध नहीं है.
हर बार तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक के आदेश के बाद वन्यप्राणी चिकित्सक बिना जंगल सफारी डायरेक्टर की अनुमति के ड्रग्स निकालते रहे.
कितना जरुरी है शर्तों का पालन करना
इस मामले में पत्र लिखने वाले वन्यजीव प्रेमी रायपुर के नितिन सिंघवी ने बताया कि 2023 के अंत तक तत्कालीन डायरेक्टर जंगल सफारी को समझ आ गया था कि वर्तमान प्रधान मुख्य वन संरक्षक से सीधे आदेश प्राप्त करने के बाद उनको बताये बिना ड्रग्स स्टॉक से निकाल ली जाती है.
वर्ष 2023 के आखिरी महीनों में 40 गौर को बारनवापारा अभ्यारण से गुरु घासीदास नेशनल पार्क ले जाने की योजना तैयार की गयी.
बारनवापारा अभ्यारण बलौदा बाजार जिले में आता है, इसलिए डायरेक्टर जंगल सफारी ने आबकारी उपायुक्त रायपुर से बारनवापारा अभ्यारण में ड्रग के उपयोग की अनुमति मांगी.
परन्तु उपायुक्त आबकारी रायपुर ने अनुमति नहीं दी क्यों कि आबकारी उपायुक्त ने लाइसेंस सिर्फ जंगल सफारी परिसर में उपयोग हेतु दिया था.
उपायुक्त ने कहा कि उनके द्वारा दूसरे जिलों के लिए अनुमति नहीं दी जाती.
सिंघवी ने बताया कि उपायुक्त द्वारा अनुमति नहीं दिया जाना बताता है कि शर्तों का पालन करना कितना अनिवार्य था.
जिसके तहत सिर्फ जंगल सफारी परिसर में एटॉर्फिन का उपयोग किया जा सकता था. परन्तु वन विभाग असम तक नारकोटिक ड्रग लेकर चला गया.
सिंघवी ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक से पूछा कि जब उन्हें लाइसेंस की शर्तों की पूरी जानकारी थी कि ड्रग का उपयोग सिर्फ जंगल सफारी परिसर नया रायपुर में हो सकता है, तब उन्होंने ड्रग को जंगल सफारी से बाहर असम और दूसरे जिलों में ले जाने का आदेश वन्यप्राणी चिकित्सक को क्यों दिया?
2020 और 2023 में अतिरिक्त खपत दर्ज होने वाली ड्रग्स कहां गई?