30 दिन की जेल पर मंत्रियों का स्थायी इस्तीफा नहीं, सिर्फ निलंबन
नई दिल्ली । डेस्क: देश के उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों को लेकर एक बड़े राजनीतिक और कानूनी घटनाक्रम में, 130वें संविधान संशोधन विधेयक की समीक्षा कर रही संसद की संयुक्त समिति ने एक बेहद महत्वपूर्ण सिफारिश की है. विपक्षी दलों की चिंताओं और विरोध के बीच समिति ने सुझाव दिया है कि यदि प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री या किसी राज्य के मुख्यमंत्री को किसी गंभीर आपराधिक मामले में लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रखा जाता है, तो उन्हें पद से स्थायी रूप से हटाने के बजाय केवल 'निलंबित' किया जाना चाहिए.
समिति द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में दो विशिष्ट और तीन सामान्य सिफारिशें की गई हैं. गौरतलब है कि पिछले वर्ष अगस्त में पेश किए गए इस मूल विधेयक में प्रावधान था कि यदि जेल में बंद प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री 30 दिनों के भीतर खुद अपने पद से इस्तीफा नहीं देते हैं, तो 31वें दिन उन्हें स्वतः ही पद से हटा दिया जाएगा.
इस विधेयक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सरकारें जेल से न चलाई जा सकें. हालांकि, अधिकांश विपक्षी दलों ने इस विधेयक को अपनी सरकारों को अस्थिर करने का हथियार बताते हुए इस संयुक्त समिति की कार्यवाही से दूरी बना ली थी.
विपक्ष के इसी विरोध और आशंकाओं को देखते हुए अब समिति ने अपने रुख में बड़ा बदलाव किया है. इस सप्ताह अपनाई जाने वाली रिपोर्ट में समिति ने 'हटाने' (रिमूवल) शब्द की जगह 'निलंबन' (सस्पेंशन) शब्द का इस्तेमाल करने का प्रस्ताव दिया है. यानी, जब तक कानूनी कार्यवाही का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक आरोपी मंत्रियों का पद केवल निलंबित रहेगा, वे स्थायी रूप से बर्खास्त नहीं होंगे.
इसके साथ ही, समिति ने एक 'ऑटोमैटिक रिवर्सल' (स्वतः बहाली) या सनसेट क्लॉज जोड़ने का भी सुझाव दिया है. इसके तहत, यदि आरोपी मंत्री अदालत से बरी हो जाता है या एक तय समय सीमा के भीतर उसके खिलाफ अभियोजन की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ती है, तो उसका निलंबन स्वतः ही समाप्त हो जाएगा और उसे वापस पद मिल जाएगा.
समिति के अनुसार, यह सुरक्षा कवच इसलिए जरूरी है ताकि अदालत द्वारा निर्दोष पाए जाने वाले लोगों का निलंबन स्थायी नुकसान में न बदले.
समिति ने 'गंभीर आपराधिक अपराधों' को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है. इसके अनुसार, 5 वर्ष या उससे अधिक की सजा वाले अपराधों को ही इस श्रेणी में रखा जाएगा. इसके लिए विधेयक में एक अलग अनुसूची (शेड्यूल) जोड़ने को कहा गया है, जिससे स्पष्ट रूप से पहचान की जा सके कि किन अपराधों के तहत निलंबन की कार्रवाई होगी.
इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए समिति ने सिफारिश की है कि इन उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों से जुड़े मामलों की सुनवाई फास्ट-ट्रैक या विशेष अदालतों में की जानी चाहिए.
यदि समिति की इन सिफारिशों को स्वीकार कर लिया जाता है, तो केंद्रीय गृह मंत्रालय आवश्यक संशोधनों के साथ केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी लेगा और इसके बाद लोकसभा में आधिकारिक संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा.