लाख टके का सवाल- TMC की करोड़ों की संपत्ति किसके पास रहेगी ?
कोलकाता । डेस्क: पश्चिम बंगाल की राजनीति में चार दशकों से अधिक समय तक अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने वाली ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इस समय अपने सबसे बड़े अस्तित्व के संकट से गुजर रही है. तृणमूल कांग्रेस के भीतर मचे इस घमासान से न केवल ममता बनर्जी की राजनीतिक साख खतरे में है, बल्कि वित्तीय दुनिया में पार्टी द्वारा खड़ी की गई अरबों रुपये की अचल और चल संपत्ति पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं.
बंगाल की सत्ता में लगातार 15 वर्षों तक रहने के बाद पार्टी ने जो विशाल वित्तीय साम्राज्य खड़ा किया था, अब उस पर किसका हक होगा, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न बन चुका है.
चुनावी चंदे और अकूत संपत्ति का भविष्य अधर में:
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस देश की 36 क्षेत्रीय पार्टियों में तेलुगु देशम पार्टी के बाद दूसरी सबसे अमीर पार्टी बनकर उभरी है. वित्तीय वर्ष 2024-25 के आयकर रिटर्न में टीएमसी ने अपनी कुल कमाई 219.3538 करोड़ रुपये घोषित की थी. इसमें से 184.08 करोड़ रुपये अकेले चंदे से आए थे, जो देश के सभी क्षेत्रीय दलों में सबसे अधिक है.
इसके अलावा, फिक्स्ड डिपॉजिट के ब्याज से ही पार्टी ने 33.685 करोड़ रुपये कमाए. इससे पिछले साल यानी 2023-24 में पार्टी की कमाई 646.293 करोड़ रुपये थी. वहीं, सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक घोषित किए जाने से पहले, अप्रैल 2019 से जनवरी 2024 के बीच टीएमसी ने 1,609.5 करोड़ रुपये के बॉन्ड भुनाए थे, जिससे वह देश की दूसरी सबसे बड़ी लाभार्थी पार्टी बनी थी. अब इस भारी-भरकम फंड और बैंक खातों पर नियंत्रण को लेकर खींचतान होना तय माना जा रहा है.
संसद से विधानसभा तक बिखराव की कहानी:
तृणमूल कांग्रेस का किला केवल बंगाल विधानसभा में ही नहीं, बल्कि देश की संसद में भी ढह रहा है. हालिया विधानसभा चुनावों में टीएमसी के टिकट पर जीते 80 विधायकों में से दो को निष्कासित कर दिया गया है, जबकि 56 विधायकों ने बागी नेता रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने के लिए अपना खुला समर्थन दे दिया है. दिल्ली के गलियारों में भी पार्टी का कुनबा बिखर चुका है.
राज्यसभा में टीएमसी के 13 सांसद थे, जिनमें से सुखेंदु शेखर राय और सुष्मिता देव के बाद अब प्रकाश चिक बड़ाइक ने भी इस्तीफा दे दिया है, जिससे यह संख्या घटकर 10 रह गई है. लोकसभा में भी पार्टी के 28 में से 19 सांसदों के बागी गुट में शामिल होने की खबरें हैं, जो अब एक अलग समूह बनाने की तैयारी में हैं.
इंदिरा गांधी के इतिहास की पुनरावृत्ति:
ममता बनर्जी आज जिस चौराहे पर खड़ी हैं, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी अपने राजनीतिक जीवन में दो बार, 1969 और 1978 में, इसी दौर से गुजर चुकी हैं. साल 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ, तब इंदिरा गांधी को पार्टी की संपत्ति, पुस्तकालय और अपना पुराना चुनाव चिन्ह 'दो बैलों की जोड़ी' गंवाना पड़ा था. इसके बाद उन्होंने 'गाय और बछड़ा' चुनाव चिन्ह के साथ वापसी की, लेकिन 1978 में उन्हें फिर से पार्टी से निष्कासित कर दिया गया और चुनाव आयोग ने वह प्रतीक भी फ्रीज कर दिया.
हालांकि, इतिहास गवाह है कि इंदिरा गांधी ने जनसमर्थन के दम पर दोबारा सत्ता हासिल की. आज ममता बनर्जी के सामने भी वैसी ही चुनौती है, क्योंकि पार्टी का पुराना कार्यालय नवीनीकरण के अधीन है और अस्थायी कार्यालय के मालिकों ने भी पार्टी को परिसर खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया है.
दल-बदल कानून और चुनाव आयोग की भूमिका:
इस पूरे मामले में तकनीकी और कानूनी पेंच भी फंसता नजर आ रहा है. संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी अन्य दल में विलय के बिना केवल अलग गुट बना लेने से अयोग्यता से बचना मुश्किल होता है. हालांकि, देश के वरिष्ठ वकीलों का मानना है कि हाल के वर्षों में संसदीय दल के विभाजन को ही असली पार्टी का विभाजन मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जिससे इस कानून की मूल आत्मा कमजोर हुई है.
फिलहाल, बागी गुटों ने चुनाव आयोग के पास पार्टी के नाम या सिंबल पर दावेदारी नहीं ठोकी है. चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत चुनाव आयोग को यह तय करने का पूरा अधिकार है कि असली पार्टी कौन सी है. फिलहाल, कानूनी लड़ाई की शुरुआत हो चुकी है और मामला कलकत्ता उच्च न्यायालय तक पहुंच गया है, जहां बागी नेता को विपक्ष का नेता नियुक्त किए जाने को चुनौती दी गई है.