माओवादी युद्धविराम पत्र ने उठाए सवाल, संगठन में दिखा विभाजन
रायपुर । संवाददाता: सीपीआई (माओवादी) केंद्रीय समिति के प्रवक्ता अभय द्वारा कथित तौर पर जारी एक पत्र ने नक्सलियों के शांति वार्ता में शामिल होने की संभावना पर बहस और अनिश्चितता पैदा कर दी है. पत्र, जो 15 अगस्त का है, 17 सितंबर को सार्वजनिक हुआ. इसमें सुरक्षा अभियानों को एक महीने के लिए रोकने की मांग की गई है ताकि माओवादी नेता आत्मसमर्पण और सरकार के साथ वार्ता की नीति पर चर्चा कर सकें.
छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा ने एक और आयाम जोड़ा. उनके अनुसार, “दो अलग-अलग पत्र” सामने आए हैं: एक छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ पोलित ब्यूरो सदस्य से जुड़ा, दूसरा तेलंगाना के एक निचले स्तर के कैडर से.
उन्होंने कहा, “यह एक अलग मामला है और हमारे हित में नहीं है.” शर्मा ने दोहराया कि शांति वार्ता तभी संभव है जब माओवादी नागरिक हत्याएं बंद करें और जंगलों से बारूदी सुरंगें और आईईडी हटाएं.
अभय ने दावा किया कि मार्च से माओवादी बातचीत के लिए प्रयास कर रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया और इसके बजाय अभियान तेज कर दिए.
पत्र की प्रामाणिकता और समय पर सवाल उठे हैं. छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी डी.एम. अवस्थी ने कहा, “हमने पहले भी ऐसे कई पत्र देखे हैं. ये आते हैं, शोर मचाते हैं, लेकिन कुछ ठोस नहीं होता.”
पत्र ने माओवादी संगठन के भीतर दरार की ओर भी इशारा किया है. तेलंगाना राज्य समिति के प्रतिनिधि जगन ने इसे अभय का “निजी विचार” बताया, न कि केंद्रीय समिति का आधिकारिक निर्णय. उनके बयान, जो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा हुए, संगठन में भ्रम और असहमति को दर्शाते हैं.
पूर्व खुफिया ब्यूरो अधिकारी और पूर्व डीजीपी राजीव माथुर ने भी सावधानी बरतने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि यदि आत्मसमर्पण वास्तविक हुआ तो यह देश के लिए “बड़ी उपलब्धि” होगी और विकास का नया अध्याय शुरू हो सकता है. लेकिन उनके लंबे अनुभव के आधार पर, उन्होंने संदेह जताया कि क्या वरिष्ठ माओवादी नेता पूरी तरह हथियार डालेंगे.
माथुर ने बताया, “हाल ही में उनके कई शीर्ष कमांडर मारे गए हैं, इसलिए डर का माहौल है. लेकिन हमेशा एक ऐसा कोर रहा है जो हथियार छोड़ने से इनकार करता है. इससे पूर्ण आत्मसमर्पण की संभावना बहुत कम हो जाती है.”