महानदी ट्रिब्यूनल ने ओडिशा-छत्तीसगढ़ को कहा- ठोस प्रस्ताव लेकर आएं
भुवनेश्वर । डेस्क: महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल ने मामले की सुनवाई में हो रही लगातार देरी और दोनों राज्यों के ढुलमुल रवैये को लेकर ओडिशा और छत्तीसगढ़ सरकार के प्रति बेहद सख्त रुख अपनाया है. ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों द्वारा बार-बार स्थगन मांगे जाने पर गहरी नाराजगी जताते हुए स्पष्ट रूप से कहा है कि आपसी समझौते की बातें केवल दावों और कागजों तक सीमित नजर आ रही हैं, क्योंकि अब तक धरातल पर समाधान का कोई ठोस प्रस्ताव पेश नहीं किया गया है.
जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी, जस्टिस रवि रंजन और जस्टिस इंद्रमीत कौर कोचर की पीठ ने अपने आदेश में कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि हम जिस तरह से कार्यवाही संचालित की जा रही है, उससे कतई खुश नहीं हैं. वकीलों द्वारा बार-बार इस आधार पर समय मांगा जा रहा है कि वे समझौते पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं, लेकिन रिकॉर्ड पर अब तक किसी भी विवादित मुद्दे से जुड़ा कोई ठोस मसौदा या आम सहमति नहीं रखी गई है.
ट्रिब्यूनल ने अपनी नाराजगी को आगे बढ़ाते हुए दोनों राज्यों को 8 अप्रैल को हुई तकनीकी समिति की बैठक के मिनट्स को अंतिम रूप देने के लिए 'एक अंतिम अवसर' प्रदान किया है. यह तकनीकी बैठक मुख्य रूप से नदी में वार्षिक जल उपलब्धता के आंकड़ों पर केंद्रित थी, जो इस पूरे विवाद की जड़ है.
अदालत ने चेतावनी भरे लहजे में साफ कर दिया है कि यदि अगली सुनवाई की तारीख यानी 2 मई तक दोनों राज्य किसी आम सहमति पर नहीं पहुँचते या डेटा साझा करने में विफल रहते हैं, तो ट्रिब्यूनल आगे और इंतजार नहीं करेगा और मामले की सुनवाई मेरिट के आधार पर शुरू कर दी जाएगी.
अदालत ने इस बात पर भी विशेष गौर किया कि बीते 11 अप्रैल को दोनों राज्यों के वकीलों ने संयुक्त रूप से आश्वासन दिया था कि वे 20 अप्रैल तक जल उपलब्धता का डेटा फाइनल कर लेंगे, लेकिन वे अपनी ही समय सीमा पर कायम नहीं रहे और फिर से अधिक समय की मांग की. इसके अलावा, राज्य उन सुझावों को देने में भी विफल रहे जिनसे विवाद के मुख्य बिंदुओं को छोटा किया जा सके.
इस पूरे घटनाक्रम पर 'महानदी बचाओ आंदोलन' के संयोजक सुदर्शन दास ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे एक बड़ी विफलता बताया है. उन्होंने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है कि ट्रिब्यूनल के गठन के आठ साल बीत जाने के बाद भी दोनों राज्य सरकारें महानदी में पानी की उपलब्धता जैसे बुनियादी विषय पर पुख्ता और साझा डेटा पेश करने में असमर्थ रही हैं.
ज्ञात हो कि महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल का गठन 12 मार्च 2018 को ओडिशा द्वारा दायर एक याचिका के बाद किया गया था, जिसमें छत्तीसगढ़ द्वारा नदी के ऊपरी हिस्से में बांधों और बैराजों के निर्माण से ओडिशा में पानी के प्रवाह में कमी आने का आरोप लगाया गया था.
हालांकि हाल ही में ट्रिब्यूनल का कार्यकाल 9 महीने के लिए बढ़ाकर जनवरी 2027 तक किया गया है और दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच जल्द ही एक उच्च स्तरीय बैठक की संभावना जताई जा रही है, लेकिन ट्रिब्यूनल की इस फटकार ने साफ कर दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया अब और अधिक देरी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है.