मद्रास HC: धर्मांतरित मुस्लिमों को नहीं मिलेगा BC आरक्षण
चेन्नई । डेस्क: मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि इस्लाम धर्म अपनाने वाला कोई भी व्यक्ति पिछड़ा वर्ग (BC) मुस्लिम के दर्जे का दावा नहीं कर सकता है. अदालत ने कहा कि धर्म परिवर्तन करने के बाद व्यक्ति केवल एक मुस्लिम रह जाता है और उसे किसी विशेष जाति या उपजाति में नहीं बांटा जा सकता.
इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार के उस 2024 के शासनादेश (जी.ओ.) को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसमें धर्मांतरण करने वाले लोगों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ देने की अनुमति दी गई थी.
यह मामला थूथुकुडी जिले के एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया. हिंदू माता-पिता के घर जन्मे इस व्यक्ति ने साल 2015 में इस्लाम धर्म अपनाकर अपना नाम बदल लिया था. इसके बाद उसने 'मुस्लिम लेब्बाई' समुदाय का प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए आवेदन किया था, जिसे स्थानीय तहसीलदार ने खारिज कर दिया.
तहसीलदार के इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने 2022 में अदालत का रुख किया था. इसी बीच, राज्य सरकार ने 2024 में एक आदेश जारी कर दिया था कि पिछड़े या अनुसूचित वर्ग से इस्लाम में परिवर्तित होने वाले लोगों को आरक्षण के लाभ के लिए बीसी (मुस्लिम) माना जा सकता है.
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी.बी. बालाजी की खंडपीठ ने इस सरकारी आदेश पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि साल 1951 में भी मद्रास हाईकोर्ट ने यह व्यवस्था दी थी कि जब कोई हिंदू इस्लाम स्वीकार करता है, तो वह केवल एक मुसलमान बन जाता है. मुस्लिम समाज में उसका स्थान इस बात से तय नहीं होता कि वह धर्म परिवर्तन से पहले किस जाति का था.
अदालत ने टिप्पणी की कि जब इस्लामिक उपदेशक सदियों से यह प्रचार करते आ रहे हैं कि उनका धर्म सामाजिक समानता प्रदान करता है और इसमें कोई ऊंच-नीच नहीं है, तो ऐसे में धर्म परिवर्तन के बाद इस्लाम के भीतर भी जातियों या श्रेणियों का दावा करना पूरी तरह से विरोधाभासी है.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि ऐतिहासिक कारणों से मुस्लिम समाज में भी कुछ समुदाय या श्रेणियां बन गई हैं, लेकिन वे पूरी तरह से जन्म पर आधारित होती हैं. किसी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन के जरिए उन विशिष्ट श्रेणियों (जैसे रावथर या मरक्क्यार) में शामिल नहीं किया जा सकता.
न्यायाधीशों ने सरकार के इस कदम को शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन माना और कहा कि कार्यपालिका एक सरकारी आदेश के जरिए अदालतों के पुराने फैसलों को निष्प्रभावी नहीं बना सकती. कोर्ट ने सरकार के इस दृष्टिकोण को न केवल असंवैधानिक, बल्कि गैर-इस्लामिक बताते हुए याचिका का निपटारा कर दिया.