लेबर कोड ड्राफ्ट: काम के घंटों पर अनिश्चितता से बढ़ा शोषण का डर
नई दिल्ली । डेस्क: केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में जारी वेतन संहिता (Code on Wages) के नए ड्राफ्ट नियमों ने जानकारों और कर्मचारी संगठनों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है. इन नए नियमों में दैनिक कार्य घंटों की सीमा को स्पष्ट रूप से निर्धारित करने के बजाय, इसे सरकार के विवेक पर छोड़ दिया गया है.
वर्तमान में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 के तहत कार्य दिवस 8 घंटे का तय है, लेकिन नए मसौदे के अनुसार केंद्र और राज्य सरकारें अधिसूचना के माध्यम से कार्य घंटों को घटा या बढ़ा सकेंगी.
जानकारों और कार्यकर्ता समूहों ने इस प्रावधान पर गहरी आपत्ति जताई है. उनका तर्क है कि कार्य घंटों की स्पष्ट सीमा न होने से निजी नियोक्ता, विशेष रूप से गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर (जैसे डिलीवरी एजेंट और घरेलू सेवा प्रदाता), का शोषण कर सकते हैं.
उनका का कहना है कि हालांकि सरकार ने साप्ताहिक कार्य सीमा को 48 घंटे पर बरकरार रखा है, लेकिन दैनिक घंटों में लचीलापन होने से कंपनियां श्रमिकों से दिन में 10 से 12 घंटे तक काम करवा सकती हैं. इससे श्रमिकों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने और थकान बढ़ने का खतरा है.
मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट, गुड़गांव के प्रोफेसर और श्रम अर्थशास्त्री श्याम सुंदर के अनुसार, दैनिक कार्य घंटों पर स्पष्टता की कमी से नियोक्ताओं और श्रमिकों दोनों के लिए प्रबंधन और योजना बनाना अनिश्चित हो जाएगा.
वहीं, गिग वर्कर्स यूनियनों का कहना है कि कई प्लेटफॉर्म पहले से ही कर्मचारियों से 8 घंटे से अधिक काम ले रहे हैं, और नए नियम इस शोषण को कानूनी रूप देने का जरिया बन सकते हैं.
आलोचकों का यह भी मानना है कि महामारी के दौरान आपातकालीन शक्तियों के तहत दी गई ढील को अब स्थायी बनाया जा रहा है, जो दिहाड़ी मजदूरों और फैक्ट्री कर्मचारियों के हितों के खिलाफ है.
मंत्रालय ने फिलहाल इन नियमों पर प्रतिक्रिया मांगी है, लेकिन स्पष्टता के अभाव ने भविष्य की कार्य स्थितियों को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं.