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इजरायल चुनाव क्या खत्म होगा नेतन्याहू का युग ?

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27 जून 2026, 07:03 PM 4 मिनट में पढ़ें 2

नेतन्याहू
नेतन्याहू

तेल अवीव । डेस्क: इजरायल की राजनीति में 'अल्टीमेट सर्वाइवर' यानी हर संकट से पार पाने वाले नेता के रूप में मशहूर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस समय अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े और सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं. आगामी अक्टूबर में होने वाले आम चुनाव न केवल इजरायल का भविष्य तय करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि नेतन्याहू का लगभग चार दशकों का राजनीतिक सफर सम्मान के साथ समाप्त होगा या फिर एक कड़वी विदाई के साथ. 


क्षेत्र में जारी युद्धों को संभालने के तरीके, सेना की विफलताएं और सालों पुराने भ्रष्टाचार के मामलों ने नेतन्याहू की कुर्सी को चारों तरफ से घेर लिया है. इजरायल इस समय आंतरिक असंतोष और अंतरराष्ट्रीय दबाव के दोराहे पर खड़ा है, जिससे देश का राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया है.

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ट्रंप के साथ रणनीतिक चूक और ईरान का पलटवार


मौजूदा संकट की पृष्ठभूमि इस साल फरवरी में तब तैयार हुई जब बेंजामिन नेतन्याहू ने कथित तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य अभियान में शामिल होने के लिए राजी कर लिया. इसके जवाब में तेहरान ने इजरायल, खाड़ी देशों और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर जोरदार हमले शुरू कर दिए. इस सैन्य टकराव के बाद अमेरिका और ईरान के बीच जून में एक समझौता हुआ, जिसने नेतन्याहू की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. 


इस समझौते के तहत दोनों पक्षों ने सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तुरंत रोकने की प्रतिबद्धता जताई है. अब नेतन्याहू वाशिंगटन के इस शांति समझौते और अपनी घरेलू जनता की उम्मीदों के बीच बुरी तरह फंस गए हैं, जो ईरान और उसके समर्थित समूहों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई चाहती है.


लेबनान में फंसा सैन्य अभियान और घरेलू नाराजगी


उत्तरी सीमा पर लेबनान के सशस्त्र गुट हिजबुल्लाह के साथ जारी युद्ध नेतन्याहू के लिए गले की हड्डी बन चुका है. इजरायली सेना ने लेबनान के करीब पांचवें हिस्से पर कब्जा कर रखा है, लेकिन इसके बावजूद हिजबुल्लाह को पूरी तरह शिकस्त नहीं दी जा सकी है और उत्तरी इजरायल के शहर अब भी रॉकेट और ड्रोन हमलों के निशाने पर हैं. 


इजरायल के भीतर दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों ही धड़े नेतन्याहू की युद्ध नीति से नाराज हैं. जहां दक्षिणपंथी दल हिजबुल्लाह को पूरी तरह कुचलने और युद्ध जारी रखने का दबाव बना रहे हैं, वहीं विपक्ष उन पर अमेरिकी हितों को चोट पहुंचाने का आरोप लगा रहा है. 


पूर्व सेना प्रमुख गादी ईसेनकोट जैसे मुख्य प्रतिद्वंद्वियों का कहना है कि नेतन्याहू वाशिंगटन के सामने अपनी सैन्य रणनीति स्पष्ट करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं, जिसके कारण आज इजरायल को लेबनान में एक छोटे से हमले के लिए भी अमेरिका की अनुमति लेनी पड़ रही है.


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ता इजरायल


अक्टूबर 2023 में हमास के हमलों के बाद गाजा में शुरू हुए भीषण युद्ध ने इजरायल को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग कर दिया है. दुनिया के कई हिस्सों में इजरायल की छवि एक 'परिया देश' जैसी हो गई है, और खुद अमेरिका के राजनीतिक हलकों में भी उसकी तीखी आलोचना हो रही है. 


देश के भीतर भी इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि नेतन्याहू सरकार ने हमास के हमले से पहले और बाद की खुफिया व प्रशासनिक विफलताओं की जांच के लिए अब तक कोई स्वतंत्र जन-पूछताछ आयोग गठित नहीं किया है. जनता इस विफलता के लिए सीधे तौर पर नेतन्याहू को जिम्मेदार मान रही है और मानवाधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव ने उनकी स्थिति को और कमजोर कर दिया है.


ट्रंप की बेरुखी और अदालती मुकदमों का साया


नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय वाशिंगटन से आ रहे संकेत हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब नेतन्याहू के रवैये से थक चुके हैं और उन्होंने सार्वजनिक रूप से साफ कर दिया है कि इजरायल को अमेरिकी प्राथमिकताओं का पालन करना होगा. 


दोनों नेताओं के बीच इस साल फरवरी के बाद से एक भी सीधी मुलाकात नहीं हुई है, जो नेतन्याहू के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका है. इन कूटनीतिक चुनौतियों के साथ-साथ नेतन्याहू पर 2019 से चल रहे भ्रष्टाचार के गंभीर मुकदमे भी अंतिम चरण में हैं. 


यदि अदालत उन्हें दोषी करार देती है, तो उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है. ऐसे में अक्टूबर के चुनाव नेतन्याहू के लिए केवल सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि खुद को कानून और इतिहास के कड़े कटघरे से बचाने का आखिरी दांव बन चुके हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP