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ईरान युद्ध पर चीन की चुप्पी के पीछे क्या ताइवान का मुद्दा है?

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20 मार्च 2026, 03:40 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

शी जिनपिंग
शी जिनपिंग

नई दिल्ली । डेस्क: फरवरी 2026 में ईरान पर हुए भीषण अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद वैश्विक राजनीति का केंद्र अब तेहरान के मलबे से हटकर बीजिंग की रहस्यमयी चुप्पी पर टिक गया है. 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के तहत जब ईरान के सैन्य ठिकानों और शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया, तो दुनिया को उम्मीद थी कि चीन अपने 'रणनीतिक साझेदार' के बचाव में मजबूती से खड़ा होगा, लेकिन इसके उलट चीन का रवैया बेहद ठंडा और औपचारिक रहा. 


इस चुप्पी ने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के बीच इस चर्चा को हवा दे दी है कि क्या बीजिंग ने ईरान की बलि देकर ताइवान पर अपने भविष्य के दांव को सुरक्षित कर लिया है. 


दरअसल, युद्ध शुरू होने से ठीक एक महीने पहले चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई गोपनीय बातचीत इस ओर इशारा करती है कि दोनों महाशक्तियों के बीच एक बड़ा 'ग्रैंड डील' हुआ है. इस बातचीत के बाद अमेरिका ने ताइवान को दी जाने वाली अरबों डॉलर की सैन्य सहायता को अचानक टाल दिया, जो चीन के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है.


चीन की इस कूटनीतिक चुप्पी का सीधा संबंध उसकी 'एक चीन' नीति और ताइवान के भविष्य में विलय की योजना से जोड़कर देखा जा रहा है. बीजिंग को बखूबी अहसास है कि यदि वह ईरान के सैन्य संघर्ष में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करता है या उसे घातक हथियार मुहैया कराता है, तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई के रूप में ताइवान की सैन्य किलाबंदी तेज कर देगा. चीन के लिए ईरान एक ऊर्जा स्रोत और व्यापारिक भागीदार हो सकता है, लेकिन ताइवान उसके लिए 'अस्तित्व का प्रश्न' और राष्ट्रीय संप्रभुता का मुख्य मुद्दा है.


 ऐसे में यह माना जा रहा है कि चीन ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत ईरान को अपने हाल पर छोड़ दिया है ताकि वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों को उस स्तर पर न ले जाए जहां ताइवान पर उसका नियंत्रण मुश्किल हो जाए. चीनी विदेश मंत्रालय की केवल औपचारिक निंदा और विदेश मंत्री वांग यी का बिना हमलावर का नाम लिए 'जंगल राज' की बात करना यह दर्शाता है कि बीजिंग मध्य पूर्व के दलदल में फंसकर अपनी ताइवान केंद्रित ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहता.


जानकारों का तर्क है कि चीन इस युद्ध को एक ऐसे अवसर के रूप में देख रहा है जहां अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति और संसाधन ईरान में खपा दे, जिससे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी पकड़ कमजोर हो. इसके अलावा, चीन ने पहले ही भारी मात्रा में तेल का स्टॉक जमा कर लिया है, जो उसे युद्ध के कारण होने वाली आर्थिक अस्थिरता से सुरक्षा प्रदान करता है. 


चीन को विश्वास है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो या न हो, अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए कोई भी नई सरकार अंततः बीजिंग के ही पास आएगी. 


इस बीच, ताइवान पर अमेरिका की 'नरमी' हासिल करना चीन की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है. संक्षेप में, ईरान युद्ध पर चीन की चुप्पी केवल तटस्थता नहीं, बल्कि ताइवान को भविष्य में पूर्ण रूप से अपने नियंत्रण में लेने की एक दीर्घकालिक बिसात है. 


चीन ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि उसके लिए सिद्धांतों और साझेदारियों से कहीं ऊपर उसकी क्षेत्रीय अखंडता और ताइवान का मुद्दा है, जिसके लिए वह अपने सबसे करीबी सहयोगियों की अनदेखी करने को भी तैयार है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP